Hindustan Construction Co. Ltd v. Income Tax Officer (Companies Circle) Bombay & Anr
Supreme Court
[1965] 2 S.C.R. 414 10 Dec 1964 In favour of: Revenue
Forum / Bench
Supreme Court
Parties
Hindustan Construction Co. Ltd v. Income Tax Officer (Companies Circle) Bombay & Anr
Date of order
10 Dec 1964
Assessment year(s)
1949-50, 1947-48, 1955-56, 1951-52
Outcome
Dismissed
Case summary
In Hindustan Construction Co. Ltd v. Income Tax Officer (Companies Circle) Bombay & Anr, the Supreme Court (1964) dismissed the appeal under Section 50 of the Income-tax Act. The decision went in favour of the Revenue.
Issue: 49E-Claim of Set-<>ff-Prior adjudication of amount of refund due whether necessary-"found to be due", meaning of-"Jn lieu of payment", meaning of-Set-off can be given only when there is subsisting obligation to make refund.
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Sections referenced in this judgment
The order — as passed by the Supreme Court
Case: HINDUSTAN CONSTRUCTION CO. LTD. versus INCOME TAX OFFICER (COMPANIES CIRCLE) BOMBAY & ANR. [[1965] 2 S.C.R. 414] (1965)
(इंग्रजीमध्ये टंकलि�खि�त के�ेल्या न्यायनि�र्ण�याचा मराठी अ�ुवाद)
[१९६५] २ सव*च्च न्याया�य अहवा� ४१४
निहंदुस्था� कनस्टक्श� कंप�ी मया�निदत
निवरुद्ध
आयकर अलि6कारी (कंप�ी मंडळ) मुंबई आलिर्ण अन्य
१० निडसेंबर १९६४
[सरन्याया6ीश न्यायमूत? पी. बी. गजेंद्रगडकर,
न्यायमूत? एम. निहदायतुल्लाह, न्यायमूत? जे. सी. शहा,
न्यायमूत? एस. एम. लिसकरी आलिर्ण न्यायमूत? आर. एस. बच्छावत]
भारतीय आयकर कायदा, १९२२ (१९२२ चा ११), क�म ४९ ई - वजावटीचा दावा - देय परताव्याच्या रकमेचा पूव�नि�र्ण�य आवश्यक आहे का, "देय असल्याचे आढळ�े", याचा अर्थ� - "देयकाच्या बदल्यात", याचा अर्थ� - वजावटीचा �ाभ तेंव्हाच निद�ा जाऊ शकतो जेव्हा परतावा देण्याचे बं6� असे�.
आयकर (दुहेरी करमुक्ती) (भारतीय राज्ये) नि�यम, १९३९ च्या क�म ५ अन्वये अपी�कर्त्य� कंप�ी�े भारतीय राज्यात भर�ेल्या
प्राखिYकराच्या परताव्यासाठी दावा के�ा. प्राखिYकर निवभागा�े हा दावा मुदतबाह्य असल्या�े फेटाळू� �ाव�ा होता. प्राखिYकर आयुक्त आलिर्ण केंद्रीय महसू� मंडळा�े हस्तक्षेप करण्यास �कार निद�ा आलिर्ण अपी�कर्त्या�े र्त्यंच्या आदेशानिवरुद्ध पुढी� कायदेशीर उपाय के�ा �ाही. र्त्य�ंतर प्राखिYकर �ार्त्यकडू� करण्यात येत अस�ेल्या काही कर मागण्यांवर अपी�कर्त्या�े भारतीय प्राखिYकर अलि6नि�यम, १९२२ च्या क�म ४९ ई �ुसार, नि�यम ५ अंतग�त ज्या रकमेसंदभा�त यापूव? अज� के�ा आहे, ती रक्कम मागर्णीच्या तु��ेत रा�ू� ठेवावी, अशी निव�ंती के�ी. प्राखिYकर अलि6काऱ्यां�ी हा दावाही फेटाळू� �ावल्या�े यालिचकाकर्त्या�े घट�ेच्या क�म २२६ अन्वये उच्च न्याया�यात 6ाव घेत�ी. उच्च न्याया�या�े असे ग्राह्य 6र�े की, क�म ४९ इ म6ी� अलिभव्यक्ती "देय असल्याचे आढळ�े" चा स्पष्ट अर्थ� असा होतो की, वजावटीच्या दाव्यापूव?, एक नि�र्ण�य असर्णे आवश्यक आहे ज्यामध्ये वजावटीचा दावा करर्णाऱ्या व्यक्ती�ा परताव्याच्या मागाे देय रक्कम आढळ�ी आहे. अपी�कर्त्य�च्या बाजू�े असा कोर्णताही नि�र्ण�य �सल्या�े रिरट यालिचका फेटाळण्यात आ�ी. मात्र क�म १३३ (१) (क) अन्वये अज�दारा�ा योग्यता प्रमार्णपत्र देण्यात आ�े.नि�र्ण�य : (१) क�म ४९ ई अन्वये दावा मंजूर करण्यापूव?
पूव�नि�र्ण�य असर्णे आवश्यक �ाही. क�म ४९ ब अन्वये अज� केल्यावर परतावा देय आहे की �ाही, हा प्रश्न ठरनिवण्यापासू� आयकर अलि6काऱ्या�ा रो�ण्यासार�े काहीच �ाही. 'आढळ�े' या शब्दांमुळे पूव�नि�र्ण�य झा�ाच पानिहजे, असा नि�ष्कर्ष� नि�घत �ाही. [४१९ डी-ई]
२) क�म ४९ ई अंतग�त वजावट मात्र "देयकाच्या बदल्यात" असर्णे आवश्यक आहे, ज्यात असे �मूद के�े गे�े आहे की, देयक र्थनिकत आहे म्हर्णजेच आयकर नि�रीक्षकावर भरर्णे बं6�कारक आहे. परताव्याचा दावा अंनितम आदेशाद्वारे प्रनितबंलि6त असल्यास देयक देर्णे बं6�कारक आहे, असे म्हर्णता येर्णार �ाही. [४१९ एफ - जी]
स्टब्स निवरुद्ध साव�जनि�क अलिभयोग संचा�क, २४ क्यू.बी.डी. ५७७, अव�ंब� के�े.
३) सध्याच्या प्रकरर्णात आयुक्त आलिर्ण केंद्रीय महसू� मंडळा�े भारतीय राज्य नि�यमाव�ीच्या नि�यम ५ अन्वये अपी�कर्त्य�चा दावा फेटाळण्याचे आदेश अंनितम ठर�े होते. क�म २२६ अन्वये यालिचकेतही र्त्यं�ा आव्हा� देण्यात आ�े �व्हते. अशा प्रकारे अपी�कर्त्या�ा देयक देण्याचे आयकर अलि6काऱ्यावर कोर्णतेही बं6� �व्हते आलिर्ण म्हर्णू�च क�म ४९ ई अंतग�त अपी�कर्त्य�चा दावा अयशस्वी ठरतो. [४१९ जी - एच]
निदवार्णी अपीलि�य अलि6कार क्षेत्र : निदवार्णी अपी� क्रमांक १३६/१९६४.
मुंबई उच्च न्याया�याच्या संकीर्ण� अज� क्रमांक ३३३/१९६०
म6ी� निद�ांक २४ फेब्रुवारी १९६१ च्या न्यानि�र्ण�य व आदेशावरु� अपी�.
अपी�कर्त्य�साठी : ए. व्ही. निवश्व�ार्थ सास्त्री, टी. ए. रामचमद्र,
जे. बी. दादाचंजी, ओ. सी. मार्थुर आलिर्ण रवींदर �ारायर्ण.
उत्तरवादीसाठी : आर. गर्णपती, आर. एच. 6ेबर आलिर्ण आर. एस. सचदे. न्याया�याचा न्यायनि�र्ण�य न्यायमूत? लिसकरी यां�ी पारिरत के�ा :
भारतीय राज्यघट�ेच्या क�म २२६ अन्वये अपी�कर्त्या�े
दा�� के�े�ी यालिचका फेटाळू� �ावर्णाऱ्या २४ फेब्रुवारी १९६१ च्या नि�र्ण�यानिवरुद्ध मुंबई उच्च न्याया�या�े निद�ेल्या प्रमार्णपत्रावरु� हे अपी� आहे. या आवाह�ामुळे भारतीय प्राखिYकर कायदा, १९२२ च्या क�म ४९ ई (यापुढे कायदा म्हर्णू� संबोलि6त) च्या रच�ेनिवर्षयी एक छोटासा प्रश्न उपखिस्थत होतो. या प्रश्ना�ा सामोरे जाण्यापूव?, संबंलि6त तथ्ये मांडर्णे आवश्यक आहे.
अपी�कर्त्या�े संबंलि6त वेळी केवळ भारतातच �व्हे, तर
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हिं�दुस्तान कंस्ट्रक्शन कंपनी लि�मि�टेड
बना�
(कंपनी सक �) आयकर अधि�कारी बॉम्बे और अन्य
10 1964मिदसंबर
[पी. बी. , सी.जे., ए�. , जे., सी. शा�, एस.ए�. .एस. बछावत, जे.जे.] गजेंद्रगढ़करमि�दायतुल्लासिसकरी और आरभारतीय आयकर, 1922 (11/1922), �ारा 49 ई - �ुजरा का दावा - क्या देय रिरफंड की राशिश का पूव - "देय पाया गया", - "", अधि�मिनर्ण य आवश्यक �ैका अर्थ भुगतान के बद�े �ेंका अर्थ �ुजरा केव� तभी मिदया जासकता �ै जब �ौजूदा रिरफंड करने की बाध्यता �ो।
अपी�कता कंपनी ने एक भारतीय राज्य �ें भुगतान मिकए गए आयकर की वापसी के लि�ए आयकर(दो�रा करा�ान रा�त) () , 1939 की �ारा 5 भारतीय राज्यमिनय�के त�त दावा मिकया। आयकर अधि�कारी नेदावे को का�बाधि�त बताकर खारिरज कर मिदया। आयकर आयुक्त और केंद्रीय राजस्व बोड ने �स्तक्षेप करने सेइनकार मिकया और अपी�कता ने उनके आदेशों के लिख�ाफ कोई अन्य कानूनी उपचार �ेतु प्रयास न�ी मिकया।, इसके बाद आयकर अधि�कारी द्वारा की गई कुछ कर �ांगों परअपी�कता ने प्रत्यावेदन मिदया मिक सिजन राशिशयों के5 , 1922 के �ारासंबं� �ें प��े मिनय� के त�त आवेदन मिकया गया र्था उनको भारतीय आयकर अधि�मिनय�49 ई द्वारा प्रदान की गई �ांग के मिवरुद्ध �ुजरा मिकया जाना चामि�ए। आयकर अधि�कारिरयों ने इस दावे को भी, 226 खारिरज कर मिदयाअपी�कता भारतीय संवी�ान के अऩुच्छेद के त�त उच्च न्याया�य �ें गया। उच्च49"देय पाया गया" , एकन्याया�य ने �ाना मिक �ारा ई �ें अशिभव्यमिक्त का स्पष्ट अर्थ �ै मिक �ुजरा के दावे से प��ेअधि�नर्ण यन �ोना चामि�ए सिजसके त�त �ुजरा का दावा करने वा�े व्यमिक्त को �न वापसी के रूप �ें एक राशिश देय, �ो। चूंमिक अपी�कता के पक्ष �ें ऐसा कोई अधि�मिनर्ण यन न�ीं र्थाइसलि�ए रिरट याधिचका खारिरज कर दी गई। यद्यमिप133(1)(सी) अनुच्छेद के त�त अपी�कता को मिफटनेस का प्र�ार्ण पत्र प्रदान मिकया गया।
,: (i49,�ारिरत मिकयाय� आवश्यक न�ीं �ै मिक �ारा ई के अन्तग त मिकसी दावे की स्वीकार करने से पूव 49कोई पूव अधि�मिनर्ण यन �ो। जब �ारा ई के अन्तग त आवेदन मिकया जाता �ै तो आयकर अधि�कारी को इस प्रश्न""का मिन�ा रर्ण करने से रोकने के लि�ए ऐसा कुछ भी न�ीं �ै मिक क्या रिरफंड देय �ै या न�ीं। शब्द पाया जाता �ैय� आवश्यक न�ीं �ै मिक इससे य� मिनष्कर्ष मिनक�े मिक पूव अधि�मिनर्ण य �ोना आवश्यक �ो। [419 डी-ई]
(i) i�ारा 49E के त�त �ुजरा को "भुगतान के बद�े �ें" �ोना चामि�ए, सिजसका अर्थ य� �ै मिक भुगतान, बकाया �ै यानी आयकर अधि�कारी परभुगतान मिनव �न करने की बाध्यता �ै। यमिद रिरफंड का दावा अंधित� आदेश-, [419 एफजी़]से वर्ित �ैतो य� न�ीं क�ा जा सकता मिक भुगतान करने की बाध्यता बनी �ुई �ै।
24 .बी.डी. 577 स्टब्बस बना� मिनदेशक �ोक अशिभयोजन क्यूपर मिवश्वास व्यक्त मिकया।
(i) i) iवत �ान �ा��े �ें आयुक्त और केंद्रीय राजस्व बोड के भारत राज्य मिनय� के मिनय� 5 के त�त226 अपी�कता के दावे को खारिरज करने का आदेश अंधित� र्था। उन्�े अनुच्छेद के त�त याधिचका �ें भी चुनौतीन�ीं दी गई। इस प्रकार अपी�कता को भुगतान करने के लि�ए आयकर अधि�कारी की ओर से कोई बाध्यता न�ीं, अतः �ारा 49E [419 जी-एच]र्थीके त�त अपी�कता का दावा को मिवफ� �ोने योग्य र्था।
: 136/1964.सिसमिव� अपी�ीय क्षेत्राधि�कारसिसमिव� अपी� संख्या
333/1960 24 फरवरी 1961प्रकीर्ण प्रार्थ नापत्र संख्या �ें बॉम्बे �ाई कोट के मिनर्ण य व आदेश मिदनांक मिवरुद्ध अपी�।
ए. वी. , टी. ए. , जे.बी. दादाचंजी, ओ. सी.अपी�कता के लि�ए अधि�वक्तामिवश्वनार्थ शास्त्रीरा�चन्द्र, �ार्थुर और रहिंवदर नारायर्ण
. , आर. एच. ढेबर और आर. प्रधितवादी के लि�ए अधि�वक्ता आरगर्णपधित अय्यरएस सच र्थे।
न्याय�ूर्ि सीकरी द्वारा न्याया�य का मिनर्ण य सुनाया गया
, 24 फरवरी 1961 प्रस्तुत अपी�बॉम्बे के उच्च न्याया�य द्वारा के पारिरत मिनर्ण य �ें मिदए गए प्र�ार्ण पत्र के, 226 मिवरुद्ध �ैसिजस�ें भारतीय संमिव�ान के अनुच्छेद के अंतग त दायर याधिचका को खारिरज कर मिदया गया र्था।, 1922 () की �ाराय� अपी� भारतीय आयकर अधि�मिनय�सिजसे इसके बाद अधि�मिनय� के रूप �ें जाना जाएगा49, ई के मिन�ा र्ण के संबं� �ें एक संधिक्षप्त प्रश्न उत्पन्न करती �ै। इससे प��े मिक �� इस प्रश्न पर मिवचार करेंप्रासंमिगक तथ्यों को सा�ने रखना आवश्यक �ै।
Case: HINDUSTAN CONSTRUCTION CO. LTD. versus INCOME TAX OFFICER (COMPANIES CIRCLE) BOMBAY & ANR. [[1965] 2 S.C.R. 414] (1965)
Section: CONCLUSION
HINDUSTAN CONSTRUCTION CO. LTD.
v.
INCOME TAX OFFICER (COMPANIES CIRCLE) BOMBAY &ANR.
December 10, 1964 {P. B. GAJENDRAGADKAR, C. ]., M. HIDAYATULLAH, J. C. SHAH, S. M. SIKRI and R. S. BACHAWAT, JJ.J
lr.dian Income-tax, 1922 (11 of 1922), s. 49E-Claim of Set-<>ff-Prior adjudication of amount of refund due whether necessary-"found to be due", meaning of-"Jn lieu of payment", meaning of-Set-off can be given only when there is subsisting obligation to make refund.
The appellant company made a claim under s. 5 of the Incomo-tax (Double Taxation Relief) (Indian States) Rules, 1939, for refund of the income-tax paid by it in an Indian State. The claim was rejected by the Income-tax Officer as time-barred. The Commissioner of Income-tax and the Central Board of Revenue refused to interfere and the appellant sought no further legal remedy against their orders. Subsequently on certain tax demands being made by the Income-tax Officer, the appellant made repro-sentation that the amounts in respect of which application had earlier been made under r. 5 should be set off against the demand as pro\ided by •· 49E of the Indian Income-tax Act, 1922. The Income-tax authoritieo having rejected this claim also, the appellant went to the High Court under Art. 226 of the Constitution. The High Court held that the expression "found to be due" in s. 49E clearly meant that there must be, prior to the claim of set off, an adjudication whereunder an amount is found due by way of refund to the person claiming set-off. Since there was no such adjudication in the appellant's favour, the writ petition was dis-missed. However a certificate of fitness under Art. 133(1) (c) was granted to the appellant.
HELD : (i) It is not necessary that there should be a prior adjudication before a claim can be allowed under s. 49E. There is nothing to debar the Income-tax Officer from determining the question whether a refund is due or not when an application is made to him under s. 49E. The words "is found" do not necessarilv lead to the conclusion that there must be a prior adjudication. [419 D-EJ
(ii) The set-off under s. 49E must however be "in lieu of payment" which expression connotes that payment is outstanding I.e. there is a sub-sisting obligation on the Income-tax Officer to pay. If a claim to refund is barred bv a final order. it cannot be said that there is a subsisting obligation to make the payment. [419 F-GJ
Slllbbs v. Director of Public Prosecutions 24 Q.B.D. 577, relied on.
(iii) In the present case the orders of the Commissioner and the Central Board of Revenue rejecting the appellant's claim under r. 5 of the Indi.'.1n S!zte Rules had become final. They were not challenged even in the petition under Art. 226. There was thus no subsisting obligation on the part of the Income-tax Officer to make payment to the appellon!, and the claim of the appellant under s. 49E must therefore, fail. [419 G-H]
CIVIL APPEI.LATE JURISDICTION: Civil Appeal No. 136 of 1964;
B
C
D
E
F
G
H
Appeal from the judgment and order dated February 24, 1961 of the Bombay High Court in Misc. Application No. 333 of 1960.
A. V. Viswanatha Sastri, T. A. Ramachandra, I. B. Dada-
chanji, 0. C. Mathur and Ravinder Narain, for the appellant
B
R. Ganapathy Iyer, R. H. Dheber and ~. S. Sachthey, for the respondent.
The Judgment of the Court was delivered by :
Sikri, J. This is an appeal on a certificate granted by the ·C High Court of Bombay against its judgment dated February 24, 1961, dismissing the petition filed by the appellant under Art. 226 of the Constitution of India. This appeal raises a short question as to the construction of s. 49E of the Indian Income-Tax Act, 1922, hereinafter referred to as the Act. Before we deal with this question, it is necessary to set out the relevant D facts.
Case: HINDUSTAN CONSTRUCTION CO. LTD. versus INCOME TAX OFFICER (COMPANIES CIRCLE) BOMBAY & ANR. [[1965] 2 S.C.R. 414] (1965)
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ਹਿੰਦੁਸਤਾਨਨਿਰਮਾਣਕੰਪਨੀਲਿਮਟਿਡ
ਬਨਾਮ
ਇਨਕਮਟੈਕਸ (ਕੰਪਨੀਸਰਕਲ) ਬੰਬੇਅਤੇਹੋਰਅਧਿਕਾਰੀ
10 ਦਸੰਬਰ 1964
(ਪੀ. ਬੀ. , ਸੀ.ਜੇ, ਐੱਮ. , ਜੇਸੀ. ,ਐੱਸ. ਐੱਮ.ਗਜੇਂਦਰਗਦਕਰਹਿਦਾਇਤੁਲ੍ਲਾਹਸ਼ਾਹਅਤੇਆਰ. ਐੱਸ. ਬਚਾਵਤ, ਜੇ. ਜੇ.)ਸਿਕਰੀ
ਭਾਰਤੀਆਮਦਨ-ਟੈਕਸ, 1922 (1922 ਦਾ11), 49 ਈ-ਸੈੱਟਦਾਦਾਅਵਾ-ਜੇਹੋਵੇਦੀਰਕਮਦਾਫੈਸਲਾਸੈਕਸ਼ਨ-"ਬਕਾਇਆਪਾਇਆ",ਜ਼ਰੂਰੀਤਾਂਰਿਫੰਡਪਹਿਲਾਂਗਿਆਭਾਵ-"ਭੁਗਤਾਨਦੇਬਦਲੇ", ਭਾਵ-ਸੈੱਟ-ਆਫਹੋਸਕਦਾਹੈ।ਇਹਹੀਜਾਵੇਗਾਉਦੋਂਦਿੱਤਾਦੇਣਦੀਹੋਵੇ।ਜਦੋਂਰਿਫੰਡਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ
ਅਪੀਲਕਰਤਾਕੰਪਨੀਨੇਸੈਕਸ਼ਨ 5 ਦੇਇੱਕਭਾਰਤੀਰਾਜਇਸਦੁਆਰਾਅਦਾਕੀਤੇਗਏਆਮਦਨ-ਟੈਕਸਦੇਲਈਦਾਅਵਾਕੀਤਾਵਿੱਚਇਨਕੋਮੋ-ਟੈਕਸ (ਡਬਲਰਿਫੰਡਟੈਕਸੇਸ਼ਨਰਿਲੀਫ) (ਭਾਰਤੀਰਾਜ) ਨਿਯਮ, 1939।ਇਸਦਾਅਵੇਨੂੰਆਮਦਨਕਰਨੇਦੀਪਾਬੰਧੀਕੇਰੱਦਕਰਸੀ।ਆਮਦਨਕਰਅਤੇਅਧਿਕਾਰੀਸਮੇਂਕਹਿਦਿੱਤਾਕਮਿਸ਼ਨਰਕੇਂਦਰੀਮਾਲਬੋਰਡਨੇਦਖਲਦੇਣਤੋਂਇਨਕਾਰਕਰਦਿੱਤਾਅਤੇਅਪੀਲਕਰਤਾਨੇਉਨ੍ਹਾਂਦੇਆਦੇਸ਼ਾਂਵਿਰੁੱਧਕੋਈਹੋਰਕਾਨੂੰਨੀਉਪਾਅਨਹੀਂਮੰਗਿਆ।ਇਸਤੋਂਬਾਅਦਕੁਝਟੈਕਸਾਂਉੱਤੇਆਮਦਨਕਰਅਧਿਕਾਰੀਵੱਲੋਂਕੀਤੀਆਂਜਾਰਹੀਆਂਮੰਗਾਂਨੂੰਮੰਨਦਿਆਂਅਪੀਲਕਰਤਾਨੇਉਹਰਕਮਦੇਸਬੰਧਰੂਲ 5 ਦੇਗਈਦਿੱਤਾਕਿਜਿਸਵਿੱਚਅਰਜ਼ੀਪਹਿਲਾਂਤਹਿਤਦਿੱਤੀਸੀ, ਇਨਕਮਟੈਕਸਐਕਟ 1922 ਦੇਸੈਕਸ਼ਨ 49 ਈਦੇਸੰਗਾਦੇਰੱਦਕੀਤਾਤਹਿਤਵਿਰੁੱਧਜਾਣਾਚਾਹੀਦਾਹੈ।.ਆਮਦਨ-ਕਰਅਧਿਕਾਰੀਨੇਇਸਦਾਅਵੇਨੂੰਵੀਰੱਦਕਰਦਿੱਤਾ,ਅਪੀਲਕਰਤਾਸੰਵਿਧਾਨਦੀਅਨੁਛੇਦ 226 ਦੇਤਹਿਤਹਾਈਕੋਰਟਗਿਆ।ਹਾਈਕੋਰਟਨੇਫੈਸਲਾਦਿੱਤਾਕਿਸੈਕਸ਼ਨ 49 ਈਵਿੱਚਸਮੀਕਰਨ "ਬਣਦਾਪਾਇਆਗਿਆ"।ਦਾਸਪੱਸ਼ਟਅਰਥਇਹਸੀਬੰਦਕਰਨਦੇਦਾਅਵੇ, ਇੱਕਫੈਸਲਾਹੋਣਾਚਾਹੀਦਾਹੈਦੇਕਿਤੋਂਪਹਿਲਾਂਜਿਸਬੰਦਕਰਨਦਾਦਾਅਵਾਕਰਨਵਾਲੇਨੂੰਦੇਰੂਪਬਕਾਇਆਤਹਿਤਵਿਅਕਤੀਰਿਫੰਡਵਿੱਚਰਕਮਪਾਈਹੈਅਪੀਲਕਰਤਾਦੇਹੱਕਕੋਈਫੈਸਲਾਸੀ,ਜਾਂਦੀਕਿਉਂਕਿਵਿੱਚਅਜਿਹਾਨਹੀਂਇਸਲਈਰਿੱਟਪਟੀਸ਼ਨਖਾਰਜਕਰਦਿੱਤੀਗਈਸੀ।ਹਾਲਾਂਕਿਅਪੀਲਕਰਤਾਨੂੰਅਨੁਛੇਦ133 (1) (ਸੀ) ਦੇਤੰਦਰੁਸਤੀਦਾਸੀ।ਤਹਿਤਸਰਟੀਫਿਕੇਟਦਿੱਤਾਗਿਆ
:(i) ਇਹਹੈਸੈਕਸ਼ਨ 49 ਈਦੇਅਧੀਨਦਾਅਵੇਦੀਕਿਹਾਜ਼ਰੂਰੀਨਹੀਂਕਿਕਿਸੇਆਗਿਆਦੇਣਫੈਸਲਾਜਾਣਾਚਾਹੀਦਾਹੈ।ਆਮਦਨਕਰਇਹਤੋਂਪਹਿਲਾਂਪਹਿਲਾਂਲਿਆਅਧਿਕਾਰੀਨੂੰਸਵਾਲਕਰਨਰੋਕਣਲਈਕੁਝਵੀਹੈਕੀਬਕਾਇਆਹੈਨਿਰਧਾਰਤਤੋਂਨਹੀਂਕਿਰਿਫੰਡਜਾਂਨਹੀਂਜਦੋਂਸੈਕਸ਼ਨ 49 ਈਦੇਤਹਿਤਉਸਨੂੰਅਰਜ਼ੀਦਿੱਤੀਜਾਂਦੀਹੈ।ਸ਼ਬਦ "ਲੱਭੇਗਏਹਨ" ਇਸ 'ਤੇਪਹੁੰਚਣਦੀਹੈਇੱਕਪੂਰਵਫੈਸਲਾਹੋਣਾਚਾਹੀਦਾਹੈ।ਸਿੱਟੇਜ਼ਰੂਰਤਨਹੀਂਕਿ(419 ਡੀ-ਈ)
(ii) ਸੈਕਸ਼ਨ 49 ਈਦੇਅਧੀਨਸੈੱਟ-ਆਫ "ਭੁਗਤਾਨਦੇਬਦਲੇ"ਹਾਲਾਂਕਿਵਿੱਚਹੋਣਾਚਾਹੀਦਾਹੈਜੋਸਮੀਕਰਨਹੈਬਕਾਇਆਭੁਗਤਾਨਕਰਨਲਈਦਰਸਾਉਂਦਾਕਿਇਨਕਮਟੈਕਸਅਧਿਕਾਰੀਉੱਤੇਭੁਗਤਾਨਕਰਨਦੀਇੱਕਉਪ-ਮੌਜੂਦਾਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀਹੈ।ਜੇਰਿਫੰਡਦੇਦਾਅਵੇਨੂੰਇੱਕਅੰਤਿਮਆਦੇਸ਼ 'ਦੁਆਰਾਰੋਕਿਆਜਾਂਦਾਹੈ।ਇਹਨਹੀਂਕਿਹਾਜਾਸਕਦਾਭੁਗਤਾਨਕਰਨਦੀਹੈ।.(419 ਐੱਫ-ਜੀ)ਕਿਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀ
ਸਟਬਸ਼ਬਨਾਮਡਾਇਰੈਕਟਰ 24 . ਬੀ. ਡੀ. 577, ਨੇਆਫ਼ਪਬਲਿਕਪ੍ਰੌਸੀਕਿਊਸ਼ਨਜ਼ਕਿਊਭਰੋਸਾਕੀਤਾ।
(iii) ਮੌਜੂਦਾਮਾਮਲੇਵਿੱਚਕਮਿਸ਼ਨਰਅਤੇਕੇਂਦਰੀਮਾਲਬੋਰਡਦੇਆਦੇਸ਼ਾਂਨੂੰਭਾਰਤੀਰਾਜਦੇਰੂਲ 5 ਦੇਅਪੀਲਕਰਤਾਦੇਦਾਅਵੇਨੂੰਰੱਦਨੂੰਰੂਪਨਿਯਮਾਂਤਹਿਤਅੰਤਿਮਦਿੱਤਾਗਿਆਸੀ।ਉਹਨਾਂਨੂੰਆਰਟੀਕਲ 226 ਅਧੀਨਪਟੀਸ਼ਨਵਿੱਚਵੀਚੁਣੌਤੀਨਹੀਂਦਿੱਤੀਗਈਸੀ।ਇਸਤਰ੍ਹਾਂਅਪੀਲਕਰਤਾਨੂੰਭੁਗਤਾਨਕਰਨਲਈਆਮਦਨਕਰਅਧਿਕਾਰੀਦੀਕੋਈਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰੀਨਹੀਂਸੀ!, ਅਤੇਇਸਲਈਸੈਕਸ਼ਨ 49 ਈਦੇਅਧੀਨਅਪੀਲਕਰਤਾਦੇਦਾਅਵੇਨੂੰਅਸਫਲਹੋਣਾਚਾਹੀਦਾਹੈ।[419 ਜੀ-ਐਚ]
ਅਪੀਲਫੈਸਲਾ 1954 ਦੀਅਪੀਲਨੰਬਰ 136 ਸਿਵਲਨਿਆਂਇਕਸਿਵਲਤੋਂ।
ਬੰਬਈਹਾਈਕੋਰਟਦੇ 24 ਫਰਵਰੀ, 1961 ਦੇਅਪੀਲਦੇਫੈਸਲੇਅਤੇ 1960 ਦੀਅਰਜ਼ੀਨੰਬਰ 333 ਦੇਆਦੇਸ਼ਤੋਂ।
ਏਵੀ . , ਟੀ. ਏ. ਰਾਮਚੰਦਰ, ਜੇਬੀ. ਦਾਦਾਚੀਸੀ, ਮਾਥੁਰਅਤੇਵਿਸ਼ਵਨਾਥਸ਼ਾਸਤਰੀਨਾਰਾਇਨ, ਅਪੀਲਕਰਤਾਲਈਰਵਿੰਦਰ
ਜਵਾਬਦੇਹਲਈ. ਆਰ. ਗਣਪਤੀਅਈਅਰ, ਆਰ. ਐਚ. ਢੇਬਰਅਤੇਆਰਏਸਸਚਥੇਅਦਾਲਤਦਾਫੈਸਲਾਇਸਦੁਆਰਾਸੀਃਦਿੱਤਾਗਿਆ
ਸੀਕਰੀ, ਜੱਜ, ਇਹਬੰਬਈਹਾਈਕੋਰਟਨੇ 24 ਫਰਵਰੀ, 1961 ਦੇਇੱਕਦੇਣਸਰਟੀਫਿਕੇਟਆਪਣੇਫੈਸਲੇਦੇਵਿਰੁੱਧਅਪੀਲਕਰਤਾਦੁਆਰਾਭਾਰਤਸੰਵਿਧਾਨਅਨੁਛੇਦ 226 ਦੇਤਹਿਤਦਾਇਰਪਟੀਸ਼ਨਨੂੰਖਾਰਜਕਰਦੀਹੈ।ਇਹਅਪੀਲਭਾਰਤੀਆਮਦਨਕਰਐਕਟ, 1922ਦੇਸੈਕਸ਼ਨ 49 ਈਦੀਉਸਾਰੀਬਾਰੇਛੋਟਾਜਿਹਾਸਵਾਲਉਠਾਉਂਦੀਹੈ।ਜਿਸਨੂੰਇਸਤੋਂ
ਬਾਅਦਐਕਟਹੈ।ਇਸਨਾਲ, ਸੰਬੰਧਤਤੱਥਕਿਹਾਜਾਂਦਾਪ੍ਰਸ਼ਨਨਜਿੱਠਣਤੋਂਪਹਿਲਾਂਕਰਨਾਹੈ।ਨਿਰਧਾਰਤਜ਼ਰੂਰੀ
ਅਪੀਲਕਰਤਾਨੇ, ਸਮੱਗਰੀ, ਨਾਭਾਰਤ, ਭਾਰਤਬਾਹਰ,ਸਮੇਂਸਿਰਫਵਿੱਚਬਲਕਿਤੋਂਅਰਥਾਤਸੀਲੋਨ, ਕੋਲਹਾਪੁਰਅਤੇਕਪੂਰਥਲਾਦੇਸਾਬਕਾਅਤੇਹੋਰ 'ਤੇਵੀਰਾਜਾਂਥਾਵਾਂਕਾਰੋਬਾਰਕੀਤਾ।ਸੀਲੋਨਅਤੇਕੋਲਹਾਪੁਰਦੀਆਮਦਨਨਾਲਸਬੰਧਤਤੱਥਦੇਣਾਜ਼ਰੂਰੀਹੈ।ਜੇਕਪੂਰਥਲਾਹੋਈਆਮਦਨਨਾਲਸਬੰਧਤਤੱਥਦੱਸੇਹਨ, ਨਹੀਂਕਿਉਂਕਿਵਿੱਚਜਾਂਦੇਤਾਂਇਹਅਪੀਲਕਰਤਾਅਤੇਮਾਲਅਸਲਸਾਹਮਣੇ।ਵਿਭਾਗਦਰਮਿਆਨਵਿਵਾਦਨੂੰਲਿਆਏਗਾਅਸੀਂਜ਼ਿਕਰਕਰਸਕਦੇਹਾਂਕਿਸੀਲੋਨਦੀਆਮਦਨਅਤੇਕੋਲਹਾਪੁਰਦੀਆਮਦਨਨਾਲਸਬੰਧਤਤੱਥਹੱਦਤੱਕਇੱਕੋਹਨ।ਕਾਫ਼ੀਜਿਹੇ
Case: HINDUSTAN CONSTRUCTION CO. LTD. versus INCOME TAX OFFICER (COMPANIES CIRCLE) BOMBAY & ANR. [[1965] 2 S.C.R. 414] (1965)
भारतीय राज्यघट�ेच्या क�म २२६ अन्वये अपी�कर्त्या�े
दा�� के�े�ी यालिचका फेटाळू� �ावर्णाऱ्या २४ फेब्रुवारी १९६१ च्या नि�र्ण�यानिवरुद्ध मुंबई उच्च न्याया�या�े निद�ेल्या प्रमार्णपत्रावरु� हे अपी� आहे. या आवाह�ामुळे भारतीय प्राखिYकर कायदा, १९२२ च्या क�म ४९ ई (यापुढे कायदा म्हर्णू� संबोलि6त) च्या रच�ेनिवर्षयी एक छोटासा प्रश्न उपखिस्थत होतो. या प्रश्ना�ा सामोरे जाण्यापूव?, संबंलि6त तथ्ये मांडर्णे आवश्यक आहे.
अपी�कर्त्या�े संबंलि6त वेळी केवळ भारतातच �व्हे, तर
भारताबाहेर, म्हर्णजे लिस�ो�, पूव?ची कोल्हापूर व कपूरर्थ�ा ही राज्ये व इतर निठकार्णी व्यवसाय के�ा. लिस�ो� आलिर्ण कोल्हापूर म6ी� उत्पन्नाशी संबंलि6त तथ्ये देर्णे आवश्यक �ाही कारर्ण कपूरर्थ�ा येर्थे के�ेल्या उत्पन्नाशी संबंलि6त तथ्ये सांनिगत�ी तर यामुळे अपी�कता� आलिर्ण महसू� यांच्याती� �रा वाद समोर येई�. आपर्ण �मूद करू शकतो की, लिस�ो� येर्थी� उत्पन्न आलिर्ण कोल्हापूर येर्थी� उत्पन्न यांची संबंलि6त तथ्ये बऱ्याच प्रमार्णात समा� आहेत.
९ जु�ै १९५४ रोजी अपी�कर्त्या�े प्राखिYकर निवभाग, कंप�ी
मंडळ, मुंबई यां�ा पत्र लि�हू� १९४९ - ५० या कर नि�6ा�रर्ण वर्षा�साठी कपूरर्थ�ा राज्यात करआकारर्णी के�ेल्या उत्पन्नाचा परतावा लिमळण्यास पात्र असल्याचे �मूद के�े. रुपये ३७,८२८/११/- भरल्याचे कराचे मूळ प्रमार्णपत्र जोडू� परताव्याचे आदेश �वकरात �वकर द्यावेत, अशी निव�ंती के�ी. २७ जू� १९ रोजी, प्राखिYकर अलि6काऱ्या�े हा दावा फेटाळू� �ाव�ा की अपी�कर्त्या�े दा�� के�े�ा दावा आयकर (दुहेरी करमुक्ती) (भारतीय राज्ये) नि�यम १९३९ च्या नि�यम ५ मध्ये �मूद के�ेल्या चार वर्षाˆच्या का�मया�देच्या आत �व्हता - ज्या�ा यापुढे भारतीय राज्याचे नि�यम म्हर्णू� संबो6�े जाई�. १८ निडसेंबर १९५६ रोजी अपी�कर्त्या�े या आदेशानिवरुद्ध कायद्याच्या क�म ३३ अ
अन्वये आयकर आयुक्त, मुंबई यांच्यासमोर फेरनिवचार यालिचका दा�� के�ी. यालिचकाकर्त्या�े यालिचकेत म्हट�े आहे की, "दुद‰वा�े कंप�ीचे संबंलि6त वर्षा�चे मूल्यांक� आयकर अलि6काऱ्या�े १९५३-५४ या आलिर्थ�क वर्षा�च्या शेवटच्या निदवशी, म्हर्णजेच ३१-३-१९५४ रोजी, जी दुप्पट लिमळकतकर सव�तीचा दावा दा�� करण्याची शेवटची तारी� होती. कंप�ी�ा मूल्यांक� आदेश प्राY होत �सल्यामुळे करदार्त्य�ा दुप्पट लिमळकतकर सव�तीसाठी दावा दा�� करर्णे भौनितकदृष्ट्या व्यवहाय� �व्हते आलिर्ण र्त्यमुळे कंप�ी�ा मूल्यांक� आदेश प्राY झा�ा तेव्हा क�म ५० अन्वये निवनिहत के�े�ी मुदत आ6ीच संप�ी होती.” आयुक्तां�ी काही चौकशी के�ी. अपी�कर्त्या�े ३० जू� १९५८ च्या र्त्यच्या पत्रात असे उत्तर निद�े की, अपी�कर्त्या�े निवनिहत मुदतीत दुहेरी आयकर सव�तीचा तात्पुरता दावा दा�� के�ा �व्हता.दुप्पट लिमळकतकर सव�तीचा दावा दा�� करण्याची शेवटची तारी� होती. कंप�ी�ा मूल्यांक� आदेश प्राY होत �सल्यामुळे करदार्त्य�ा दुप्पट लिमळकतकर सव�तीसाठी दावा दा�� करर्णे शारीरिरकदृष्ट्या व्यवहाय� �व्हते आलिर्ण र्त्यमुळे कंप�ी�ा मूल्यांक� आदेश प्राY झा�ा तेव्हा क�म ५० अन्वये निवनिहत के�े�ी मुदत आ6ीच संप�ी होती. आयुक्तां�ी काही चौकशी के�ी. अज�दारा�े ३०
जू� १९५८ च्या पत्रात असे उत्तर निद�े की, अपी�कर्त्या�े निवनिहत मुदतीत दुप्पट आयकर सव�तीचा तात्पुरता दावा के�े�ा �ाही. निवनिहत मुदतीत करदार्त्य�े दुहेरी करसव�तीचा दावा दा�� करर्णे भौनितकदृष्ट्या व्यवहाय� �व्हते, असा पु�रुच्चार यालिचकाकर्त्या�े के�ा. मात्र, आयुक्तां�ी ही यालिचका फेटाळू� �ाव�ी. ते म्हर्णा�े की, "कपूरर्थ�ा राज्यात मूल्यांक� २०-३-१९५० रोजी, म्हर्णजे मुंबई आयकर निवभागाकडू� मूल्यांक� पूर्ण� होण्याच्या �ूप पूव?च के�े गे�े होते. र्त्यमुळे मुदतीचा का�ाव6ी संपण्यापूव? तात्पुरता दावा दा�� करण्यापासू� अपी�कर्त्या�ा कोर्णीही रो��े�े �व्हते. निकमा� मूल्यांक�ाच्या वेळी प्राखिYकर अलि6काऱ्यासमोर तसा दावा कराय�ा हवा होता. क�म ५० अन्वये अशा निव�ंब माफीसाठी कोर्णतीही तरतूद �सल्या�े दावा दा�� करण्यास होर्णारा निव�ंब माफ करू शकत �ाही, याची म�ा �ंत आहे.” र्त्य�ंतर अपी�कर्त्या�े केंद्रीय महसू� मंडळाकडे 6ाव घेत�ी. केंद्रीय महसू� मंडळा�े ३१ निडसेंबर १९५८ च्या पत्राद्वारे या प्रकरर्णात हस्तक्षेप करण्यास �कार निद�ा. अपी�कर्त्या�े क�म २२६ अन्वये आयकर आयुक्त निकंवा केंद्रीय महसू� मंडळाचे वरी� आदेश रद्द करण्यासाठी उच्च न्याया�यात दाद मागण्यासाठी कोर्णतीही पाव�े उच��ी �ाहीत.
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, 24 फरवरी 1961 प्रस्तुत अपी�बॉम्बे के उच्च न्याया�य द्वारा के पारिरत मिनर्ण य �ें मिदए गए प्र�ार्ण पत्र के, 226 मिवरुद्ध �ैसिजस�ें भारतीय संमिव�ान के अनुच्छेद के अंतग त दायर याधिचका को खारिरज कर मिदया गया र्था।, 1922 () की �ाराय� अपी� भारतीय आयकर अधि�मिनय�सिजसे इसके बाद अधि�मिनय� के रूप �ें जाना जाएगा49, ई के मिन�ा र्ण के संबं� �ें एक संधिक्षप्त प्रश्न उत्पन्न करती �ै। इससे प��े मिक �� इस प्रश्न पर मिवचार करेंप्रासंमिगक तथ्यों को सा�ने रखना आवश्यक �ै।
अपी�कता ने, , , यानी सी�ोन, तात्वित्वक स�य �ेंन केव� भारत �ें बत्विhक भारत के बा�रपूव राज्योंकोh�ापुर और कपूरर्थ�ा और अन्य स्र्थानों पर भी व्यापार मिकया। सी�ोन और कोh�ापुर �ें आय से संबंधि�ततथ्य देना आवश्यक न�ीं �ै क्योंमिक यमिद कपूरर्थ�ा �ें �ुई आय से संबंधि�त तथ्य बताए गए �ैं, तो इससेअपी�कता और राजस्व के बीच वास्तमिवक मिववाद सा�ने आ जाएगा। �� उल्लेख कर सकते �ैं मिक य� सा�ान्यआ�ार �ै मिक सी�ोन आय और कोh�ापुर आय से संबंधि�त तथ्य सारगर्ित रूप �ें स�ान �ैं।
9 जु�ाई, 1954 को, अपी�कता ने आयकर अधि�कारी, कंपनी सक �, बॉम्बे को एक पत्र लि�खा, सिजस�ें1949-50 , क�ा गया मिक �ूhयांकन वर्ष के लि�एव� कपूरर्थ�ा राज्य �ें �गाए गए आय पर रिरफंड का �कदार र्था।37,828/11/- , औरउसने कर के लि�ए रुपये का भुगतान दशा ने वा�ा एक �ू� प्र�ार्णपत्र सं�ग्न मिकया गया27 जून, 1956 अनुरो� मिकया मिक शीघ्र �नवापसी का आदेश पारिरत मिकया जाए। को आयकर अधि�कारी ने इस(दो�रा करा�ान रा�त) ()आ�ार पर दावा खारिरज कर मिदया मिक अपी�कता द्वारा दायर दावा मिक भारतीय राज्य1939 [] 5 मिनय� इसके आगे भारतीय राज्य मिनय� क�ा जाएगाके मिनय� �ें मिन�ा रिरत चार सा� की स�य सी�ा, 18 , 1956 को, 33 ए केके भीतर न�ीं र्था। उक्त आदेश के मिवरुद्धमिदसंबरअपी�कता ने अधि�मिनय� की �ारा ", त�त आयकर कमि�शनरबॉम्बे के स�क्ष एक मिनगरानी दायर की। अपी�कता ने याधिचका �ें क�ा मिक दुभा ग्य से1953-54 31-कंपनी का �ूhयांकन उस वर्ष के लि�ए आयकर अधि�कारी द्वारा मिवत्तीय वर्ष के आलिखरी मिदन यानी 3-1954 , जो " को पूरा मिकया गया र्थादो�री आयकर रा�त के लि�ए उनका दावा प्रस्तुत मिकए जाने की अंधित�', दो�री आयकर रा�ततारीख र्थी। कंपनी द्वारा �ूhयांकन आदेश प्राप्त न�ीं �ोने की त्विस्र्थधित �ेंमिन�ा रिरती के लि�ए के लि�ए अपना दावा दायर करना भौधितक रूप से व्याव�ारिरक न�ीं र्था। जब कंपनी को �ूhयांकन आदेश प्राप्त �ुआतो �ारा 50 के अंतग त मिन�ा रिरत स�य के त�त अपना दावा दज करने का स�य स�ाप्त �ो चुका र्था। कमि�श्नर नेकुछ जांचे की। अपी�कता ने 30 जून, 1958 को लि�खे अपने पत्र �ें उत्तर मिदया मिक मिन�ा रिरत स�य के भीतरअपी�कता द्वारा दो�रे आयकर रा�त के लि�ए कोई अनंधित� दावा न�ीं मिकया गया र्था। अपी�कता ने अपनीद�ी� दो�राई मिक मिन�ा रिरत स�य के भीतर दो�रे कर रा�त के लि�ए अपना दावा दायर करना मिन�ा रिरती के लि�ए"/संभव" भौधितक रूप से व्याव�ारिरकन�ीं र्था। यद्यमिप कमि�श्नर ने याधिचका खारिरज कर दी।उन्�ोंने देखा मिक"20-3-1950 , यानी, कपूरर्थ�ा राज्य �ें �ूhयांकन को मिकया गया र्थाबॉम्बे आयकर अधि�कारी द्वारा �ूhयांकन पूरा, �ोने से काफी प��े। इसलि�एयाधिचकाकता को मिन�ा रिरत स�यावधि� पूर्ण �ोने से पूव एक अन्नधित� दावा दायरकरने से कोई बा�ा न�ी र्थी। क� से क� उसे असेस�ेंट के स�य आयकर अधि�कारी के सा�ने ऐसा दावा करना, 50 के त�तचामि�ए र्था। �ुझे खेद �ै मिक �ैं दावा दायर करने �ें �ुई देरी को �ाफ न�ीं कर सकताक्योंमिक �ारा ऐसी �ाफी के लि�ए कोई प्राव�ान न�ीं �ै। इसके बाद अपी�कता ने केंद्रीय राजस्व बोड के स�क्ष याचना की।31 , 1958 केंद्रीय राजस्व बोड ने अपने पत्र मिदनांक मिदसंबरद्वारा �ा��े �ें �स्तक्षेप करने से इंकार कर मिदया।226 केअपी�कता ने आयकर आयुक्त या केंद्रीय राजस्व बोड के उपरोक्त आदेशों को रद्द करने के लि�ए अनुच्छेद त�त उच्च न्याया�य �ें उच्च न्याय�य �ें चुनौती न�ीं दी।
28 , 1959 को, आय-1949-50, 1950-51 और 1951-52 केअगस्तकर अधि�कारी ने कर मिन�ा रर्ण वर्ष 29 4 ,संबं� �ें अधि�मिनय� की �ारा के त�त �ांग के तीन नोमिटस मिनग त मिकए। इसके बाद अपी�कता ने सिसतंबर
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The Judgment of the Court was delivered by :
Sikri, J. This is an appeal on a certificate granted by the ·C High Court of Bombay against its judgment dated February 24, 1961, dismissing the petition filed by the appellant under Art. 226 of the Constitution of India. This appeal raises a short question as to the construction of s. 49E of the Indian Income-Tax Act, 1922, hereinafter referred to as the Act. Before we deal with this question, it is necessary to set out the relevant D facts.
The appellant, at the material time, carried on business not only in India but also outside India, i.e. Ceylon, the former States of Kolhapur and Kapurthala and other places. It is not necessary to give the facts relating to the income in Ceylon and Kolhapur .E because if the facts relating to the income made in Kapurthala are stated, these will bring out the real controversy between the appellant and the Revenue. We may mention that it is common ground that the facts relating to Ceylon income and Kolhapur income are substantially similar.
F On July 9, 1954, the appellant wrote a letter to the Income Tax Officer, Companies Circle, Bombay, stating that for the assessment year 1949-50, it was entitled to refund on the income taxed in Kapurthala State. It attached an original certificate for tax showing payment of Rs. 37,828/11/-, and requested that a refund order be passed at an early date. On June 27, 1956, the G Income Tax Officer rejected the claim on the ground that the claim filed by the appellant was not within the time limit of four years laid down in r. 5 of Income-Tax (Double Taxation Relief) (Indian States) Rules 1939-hereinafter called the Indian States Rule5. On December 18, 1956, the ~ppellant filed a revision, under s. 33A of the Act, Rgainst the said order, before the Com-H missioner of Income-Tax, Bombay. The appellant stated in the petition that "unfortunately the Company's assessment for the year in question was completed by the Income-Tax Officer on
416 SUPREME COURT REPORTS
the last day vf the financial year 1953-54, i.e., 31-3-1954 being A the last date on which their claim for double income-tax relief should have been lodged. In absence of the assessment order being received by the Company it was not physically practicable for the assessee to lodge its claim 'for double income-tax relief and as such the time prescribed under Section 50 had already B expired when the assessment order was received by the company." The Commissioner made some enquiries. The appellant, in its letter dated June 30, 1958, replied that no provisional claim for double income-tax relief was made by the appellant within the time prescribed. The appellant reiterated its own plea that it was not "physically practicable" for th,e assessee to lodge its C claim for double-tax relief within the time prescribed. The Com-missioner, however, rejected the petition. He observed that "the assessment in the Kapurthala State was made on 20-3-1950, i.e., much before the assessment was completed by the Bombay Income-tax Officer. Nothing prevented the petitioner, therefore, from filing a provisional claim before the period of limitation was D over. At least, it should have made such a claim before the Income Tax Officer at the time of assessment. I regret I cannot condone the delay in filing the claim as there is no provision under Section 50 for such condonation." The appellant then approached the Central Board of Revenue. The Central Board of Revenue, by its letter dated December 31, 1958, declined to interfere in the E matter. The appellant did not take any steps to apply to the High Court under Art. 226 for quashing the above orders of the Com-missioner of Inocme-Tax or the Central Board of Revenue.
A
B
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ਬਾਅਦਐਕਟਹੈ।ਇਸਨਾਲ, ਸੰਬੰਧਤਤੱਥਕਿਹਾਜਾਂਦਾਪ੍ਰਸ਼ਨਨਜਿੱਠਣਤੋਂਪਹਿਲਾਂਕਰਨਾਹੈ।ਨਿਰਧਾਰਤਜ਼ਰੂਰੀ
ਅਪੀਲਕਰਤਾਨੇ, ਸਮੱਗਰੀ, ਨਾਭਾਰਤ, ਭਾਰਤਬਾਹਰ,ਸਮੇਂਸਿਰਫਵਿੱਚਬਲਕਿਤੋਂਅਰਥਾਤਸੀਲੋਨ, ਕੋਲਹਾਪੁਰਅਤੇਕਪੂਰਥਲਾਦੇਸਾਬਕਾਅਤੇਹੋਰ 'ਤੇਵੀਰਾਜਾਂਥਾਵਾਂਕਾਰੋਬਾਰਕੀਤਾ।ਸੀਲੋਨਅਤੇਕੋਲਹਾਪੁਰਦੀਆਮਦਨਨਾਲਸਬੰਧਤਤੱਥਦੇਣਾਜ਼ਰੂਰੀਹੈ।ਜੇਕਪੂਰਥਲਾਹੋਈਆਮਦਨਨਾਲਸਬੰਧਤਤੱਥਦੱਸੇਹਨ, ਨਹੀਂਕਿਉਂਕਿਵਿੱਚਜਾਂਦੇਤਾਂਇਹਅਪੀਲਕਰਤਾਅਤੇਮਾਲਅਸਲਸਾਹਮਣੇ।ਵਿਭਾਗਦਰਮਿਆਨਵਿਵਾਦਨੂੰਲਿਆਏਗਾਅਸੀਂਜ਼ਿਕਰਕਰਸਕਦੇਹਾਂਕਿਸੀਲੋਨਦੀਆਮਦਨਅਤੇਕੋਲਹਾਪੁਰਦੀਆਮਦਨਨਾਲਸਬੰਧਤਤੱਥਹੱਦਤੱਕਇੱਕੋਹਨ।ਕਾਫ਼ੀਜਿਹੇ
9 ਜੁਲਾਈ, 1954 ਨੂੰਅਪੀਲਕਰਤਾਨੇਆਮਦਨਕਰਅਧਿਕਾਰੀ, ਕੰਪਨੀਸਰਕਲ,ਬੰਬਈਨੂੰਇੱਕਪੱਤਰਲਿਖਿਆਜਿਸਵਿੱਚਕਿਹਾਗਿਆਸੀਕਿਮੁਲਾਂਕਣਸਾਲ 1949-50ਲਈ, ਉਹਕਪੂਰਥਲਾਰਾਜਟੈਕਸਵਾਲੀਆਮਦਨ 'ਤੇਦਾਹੱਕਦਾਰਹੈ।ਇਸਨੇਵਿੱਚਰਿਫੰਡਟੈਕਸਲਈਇੱਕਅਸਲਸਰਟੀਫਿਕੇਟਨੱਥੀਕੀਤਾਜਿਸਵਿੱਚ 37,828/11 ਰੁਪਏਦਾਭੁਗਤਾਨਹੈਅਤੇਬੇਨਤੀਕੀਤੀਆਰਡਰਜਲਦੀਜਲਦੀਦਿਖਾਇਆਗਿਆਕਿਰਿਫੰਡਤੋਂਪਾਸਕੀਤਾਜਾਵੇ।27 ਜੂਨ, 1956 ਨੂੰ, ਆਮਦਨਕਰਅਧਿਕਾਰੀਨੇਇਸਦਾਅਵੇਨੂੰਇਸਆਧਾਰਖਾਰਜਕਰਅਪੀਲਕਰਤਾਦੁਆਰਾਦਾਇਰਕੀਤਾਦਾਅਵਾਉੱਤੇਦਿੱਤਾਕਿਗਿਆਆਮਦਨ-ਕਰ (ਦੋਹਰਾਟੈਕਸਰਾਹਤ) (ਭਾਰਤੀਰਾਜ) 1939 ਦੇਰੂਲ 5 ਅਨੁਸਾਰਨਿਯਮਚਾਰਸਾਲਦੀਸੀਮਾਅੰਦਰਨਹੀਂਸੀ।ਜਿਸਨੂੰਭਾਰਤੀਰਾਜਨਿਯਮ 5 ਕਿਹਾਜਾਂਦਾਹੈ।18ਦਸੰਬਰ, 1956 ਨੂੰਅਪੀਲਕਰਤਾਨੇਐਕਟਦੇਸੈਕਸ਼ਨ 33 ਏ, ਕਥਿਤਆਦੇਸ਼ਦੇਵਿਰੁੱਧ,ਬੰਬੇਇਨਕਮਟੈਕਸਕਮਿਸ਼ਨਰਸਾਹਮਣੇਰਿਵਿਜ਼ਨਪਾਈ।ਅਪੀਲਕਰਤਾਨੇਪਟੀਸ਼ਨਵਿੱਚਕਿਹਾਕਿ "ਬਦਕਿਸਮਤੀਨਾਲਕੰਪਨੀਦਾਸਾਲਲਈਮੁਲਾਂਕਣਆਮਦਨਕਰਅਧਿਕਾਰੀਦੁਆਰਾਪੂਰਾਕੀਤਾਸੀ।ਸਾਲ 1953-54 ਦਾਆਖਰੀ, ਭਾਵ 31-3-1954ਗਿਆਵਿੱਤੀਦਿਨਜੋਕਿਆਖਰੀਮਿਤੀਹੈਜਿਸਨੂੰਉਨ੍ਹਾਂਦੇਦੋਹਰੇਆਮਦਨ-ਟੈਕਸਰਾਹਤਲਈਦਾਅਵਾਦਰਜਕੀਤਾਜਾਣਾਚਾਹੀਦਾਸੀ।ਕੰਪਨੀਦੁਆਰਾਪਰਾਪਤਕੀਤੇਜਾਣਦੀਮੁੱਲਾਂਕਣਆਦੇਸ਼ਅਣਹੋਂਦਵਿੱਚਇਹਕਰਦਾਤਿਆਂਲਈਆਮਦਨ-ਕਰਵਿੱਚਦੋਹਰੀਰਾਹਤਲਈਆਪਣਾਦਾਅਵਾਦਰਜਕਰਨਸਰੀਰਕਤੌਰ 'ਤੇਸੀਅਤੇਇਸਧਾਰਾ 50 ਦੇਵਿਵਹਾਰਕਨਹੀਂਤਰ੍ਹਾਂਤਹਿਤਨਿਰਧਾਰਤਸਮਾਂਪਹਿਲਾਂਹੀਖਤਮਹੋਚੁੱਕਾਸੀ।ਜਦੋਂਕੰਪਨੀਨੂੰਮੁੱਲਾਂਕਣਆਦੇਸ਼ਪ੍ਰਾਪਤਹੋਇਆਤਾਂਇਸਦੀਮਿਆਦਖਤਮਹੋਗਈ।ਕਮਿਸ਼ਨਰਨੇਕੁੱਝਪੁੱਛਗਿੱਛਕੀਤੀ।ਅਪੀਲਕਰਤਾਨੇ 30 ਜੂਨ, 1958 ਨੂੰਆਪਣੇਪੱਤਰਵਿੱਚਜਵਾਬਦਿੱਤਾਕਿਅਪੀਲਕਰਤਾਦੁਆਰਾਦੇਅੰਦਰਦੋਹਰੀਆਮਦਨ-ਟੈਕਸਰਾਹਤਲਈਕੋਈਨਿਰਧਾਰਤਸਮੇਂਆਰਜ਼ੀਦਾਅਵਾਨਹੀਂਕੀਤਾਗਿਆਸੀ।ਅਪੀਲਕਰਤਾਨੇਆਪਣੀਪਟੀਸ਼ਨਦੁਹਰਾਈਕਿਇਹਨਿਰਧਾਰਤਸਮੇਂਦੇਅੰਦਰਦੋਹਰੀਟੈਕਸਰਾਹਤਲਈਆਪਣਾ 'ਸੀ' ਦਾਅਵਾਦਰਜਕਰਨਲਈਲਈ 'ਸਰੀਰਕਤੌਰ' ਤੇ ', ਨੇਕਰਦਾਤਿਆਂਵਿਵਹਾਰਕਨਹੀਂਸੀ।ਹਾਲਾਂਕਿਕਮਿਸ਼ਨਰ
ਰੱਦਕਰਨੇ "ਰਾਜਨੂੰਕਪੂਰਥਲਾਪਟੀਸ਼ਨਦਿੱਤਾ।ਉਨ੍ਹਾਂਦੇਖਿਆਕਿਵਿੱਚਮੁੱਲਾਂਕਣ20.3.1950 ਕੀਤਾਸੀਜੋਬੰਬਈਆਮਦਨਕਰਦੁਆਰਾਗਿਆਕਿਅਧਿਕਾਰੀਮੁੱਲਾਂਕਣਪੂਰਾਕੀਤੇਜਾਣਤੋਂਬਹੁਤਪਹਿਲਾਂਕੀਤਾਗਿਆਸੀ।ਇਸਲਈ, ਪਟੀਸ਼ਨਕਰਤਾਨੂੰਸੀਮਾਦੀਖਤਮਹੋਣਦਾਅਵਾਦਾਇਰਕਰਨਕੁਝਵੀਰੋਕਮਿਆਦਤੋਂਪਹਿਲਾਂਆਰਜ਼ੀਤੋਂਨਹੀਂਸਕਿਆ।ਘੱਟੋ-ਘੱਟ, ਇਸਨੂੰਮੁੱਲਾਂਕਣਦੇਸਮੇਂਆਮਦਨਕਰਅਧਿਕਾਰੀਦੇਸਾਹਮਣੇਅਜਿਹਾਦਾਅਵਾਕਰਨਾਚਾਹੀਦਾਸੀ।ਮੈਨੂੰਅਫ਼ਸੋਸਹੈਕਿਮੈਂਦਾਅਵਾਦਾਇਰਕਰਨਵਿੱਚਦੇਰੀਨੂੰਕਰਸਕਦਾਲਈਧਾਰਾ 50 ਦੇਕੋਈਮੁਆਫ਼ਨਹੀਂਕਿਉਂਕਿਅਜਿਹੀਮੁਆਫ਼ੀਤਹਿਤਪ੍ਰਬੰਧਅਪੀਲਕਰਤਾਮਾਲੀਆਬੋਰਡਸੰਪਰਕਕੀਤਾ, ਇਸਦੇ 31ਨਹੀਂਹੈ।ਫਿਰਨੂੰ ਕੇਂਦਰੀਦਸੰਬਰ, 1958 ਦੇਪੱਤਰਦੁਆਰਾ, ਮਾਮਲੇਦਖਲਦੇਣਇਨਕਾਰਕਰ।ਵਿੱਚਤੋਂਦਿੱਤਾਅਪੀਲਕਰਤਾਨੇਇਨਕਮ -ਟੈਕਸਦੇਮਿਸ਼ਨਰੀਜਾਂਕੇਂਦਰੀਮਾਲੀਆਬੋਰਡਦੇਉਪਰੋਕਤਆਦੇਸ਼ਾਂਨੂੰਰੱਦਕਰਨਲਈਆਰਟੀਕਲ 226 ਦੇਤਹਿਤਹਾਈਕੋਰਟਵਿੱਚਅਰਜ਼ੀਦੇਣਲਈਕੋਈਕਦਮਨਹੀਂਚੁੱਕਿਆ।
28 ਅਗਸਤ, 1959 ਨੂੰਆਮਦਨਕਰਅਧਿਕਾਰੀਨੇਐਕਟ 29 ਦੇਤਹਿਤਮੁੱਲਾਂਕਣਦੇਸਾਲ 1949-50,1950-51 ਅਤੇ 1951-52 ਦੇਸੰਬੰਧਜਾਰੀਕੀਤੇਸਨ।ਵਿੱਚਨੋਟਿਸਫਿਰਅਪੀਲਕਰਤਾ 4 ਸਤੰਬਰ, 1959 ਨੂੰਇੱਕਪੱਤਰਲਿਖਕੇਆਮਦਨਕਰਅਧਿਕਾਰੀਨੂੰਬੰਦਕਰਨਦੀਬੇਨਤੀਕੀਤੀਗਈਸੀਅਪੀਲਕਰਤਾਆਮਦਨ-ਕਰ (ਦੋਹਰੇਰਿਫੰਡਕਿਟੈਕਸਰਾਹਤ) (ਸੀਲੋਨ) , 1942 ਦੀਆਂਦੇਅਨੁਸਾਰਇਸਦੇਨਾਲਨਿਯਮਧਾਰਾਵਾਂਪਡ਼੍ਹਿਆਜਾਵੇ।ਆਮਦਨਕਰਕਾਨੂੰਨਦੇਪਰਬੰਧਦੀਧਾਰਾ 49 ਏਅਤੇ 48 ਦੇਅਨੁਸਾਰ, ਮੁੱਲਾਂਕਣਸਾਲ 1942-43,1943-44 ਅਤੇ 1944-45 ਦੇਸਬੰਧਅਤੇਸਾਲ 1947-48ਵਿੱਚਮੁਲਾਂਕਣਅਤੇ 1949-50 ਕੋਲਹਾਪੁਰਅਤੇਕਪੂਰਥਲਾਦੇਸੰਬੰਧਵਿੱਚਉਕਤਮੰਗਾਂਨੂੰਲੈਕੇਰਿਫੰਡਦਾਹੱਕਦਾਰਹੈ।ਇਸਪੱਤਰਵਿੱਚਅਪੀਲਕਰਤਾਨੇਆਪਣੀਬੇਨਤੀਦੇਸਮਰਥਨਵਿੱਚਦਲੀਲਾਂਦਿੱਤੀਆਂ।ਸੰਖੇਪਵਿੱਚ, ਦਲੀਲਇਹਸੀਕਿਹਾਲਾਂਕਿਅਰਜ਼ੀਆਂਦਾਅਵਾਕਰਦੀਆਂਹਨਉਹਰਿਫੰਡਨਿਰਧਾਰਤਸਮਾਂਸੀਮਾਤੋਂਬਾਹਰਜਮ੍ਹਾਂਕੀਤੇਗਏਸਨ, ਫਿਰਵੀਅਪੀਲਕਰਤਾਨੂੰਸੈਕਸ਼ਨ 49 ਈਦੇਪ੍ਰਬੰਧ. ਆਮਦਨਕਰਅਧਿਕਾਰੀਨੂੰਬੁਲਾਉਣਲਈਅਧਿਕਾਰਸੀ।ਉੱਤੇਆਮਦਨਕਰਅਧਿਕਾਰੀਦੁਆਰਾਅਪੀਲਕਰਤਾਤੇਉਠਾਈਆਂਗਈਆਂਟੈਕਸਮੰਗਾਂਦੇਵਿਰੁੱਧਅਪੀਲਕਰਤਾਨੂੰਰਿਫੰਡਦਾਭੁਗਤਾਨਕੀਤਾਜਾਂਦਾਹੈ।ਅਪੀਲਕਰਤਾਨੇਸਮਾਨਨੁਕਤਿਆਂਦੀਤਾਕੀਦਕਰਦਿਆਂਕੇਂਦਰੀਮਾਲੀਆਬੋਰਡਤੱਕਵੀਪਹੁੰਚਕੀਤੀ।ਕੇਂਦਰੀਮਾਲੀਆਬੋਰਡਨੇ 24 ਜੂਨ, 1960 ਨੂੰਆਪਣੇਪੱਤਰਰਾਹੀਂਇਸਮਾਮਲੇਵਿੱਚਦਖਲਦੇਣਤੋਂਇਨਕਾਰਕਰਦਿੱਤਾਸੀ।
ਅਪੀਲਕਰਤਾਨੇ 7 ਅਕਤੂਬਰ, 1960 ਨੂੰਸੰਵਿਧਾਨਦੀਧਾਰਾ 226 ਤਹਿਤਪਟੀਸ਼ਨਦਾਇਰਕੀਤੀਸੀ।ਸਬੰਧਤਤੱਥਅਤੇਦੇਣਬਾਅਦ, ਅਪੀਲਕਰਤਾਨੇਬੇਨਤੀਦਲੀਲਾਂਤੋਂਕੀਤੀਹਾਈਕੋਰਟਦੀਧਾਰਾ 226 ਦੇਦੇਰੂਪਇੱਕਕਿਸੰਵਿਧਾਨਤਹਿਤਮੈਂਡਮਸਵਿੱਚਰਿੱਟ
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२८ ऑगस्ट १९५९ रोजी प्राखिYकर अलि6काऱ्या�े १९४९ - ५०, १९५० - ५१ आलिर्ण १९५१ - ५२ या कर नि�6ा�रर्ण वर्षाˆसंदभा�त कायद्याच्या क�म २९ अन्वये मागर्णीच्या ती� �ोनिटसा बजावल्या. र्त्य�ंतर अपी�कर्त्या�े ४ सप्टेंबर १९५९ रोजी एक पत्र लि�हू� प्राखिYकर अलि6काऱ्यां�ा निव�ंती के�ी की, प्राखिYकर (दुहेरी करमुक्ती) (लिस�ो�) नि�यम, १९४२ च्या तरतुदीं�ुसार अपी�कर्त्या�ा ज्या परताव्याचा हक्क होता तो परतावा रद्द करावा आलिर्ण कर नि�6ा�रर्ण वर्ष� १९४२-४३ च्या संदभा�त आयकर कायद्याच्या क�म ४९ अ आलिर्ण ४८ सह वाच�ेल्या तरतुदीं�ुसार, १९४३ - ४४ व १९४४ - ४५ हे लिस�ो�शी संबंलि6त व कोल्हापूर व कपूरर्थ�ा संदभा�ती� मूल्यांक� वर्ष� १९४७-४८ व १९४९-५० या मागण्यांच्या बदल्यात वजावट करण्यात यावी. या पत्रात अपी�कर्त्या�े आपल्या निव�ंतीच्या समर्थार्थ� युखिक्तवाद के�ा. र्थोडक्यात, युखिक्तवाद असा होता की र्त्य परताव्याचा दावा करर्णारे अज� निवनिहत का�मया�देच्या प�ीकडे सादर के�े गे�े अस�े तरी, अपी�कर्त्या�ा क�म ४९ ई च्या तरतुदीं�ुसार अजू�ही प्राखिYकर अलि6कार् या�े उपखिस्थत के�ेल्या कर मागण्यांनिवरुद्ध अपी�कर्त्य�चा देय आढळ�े�ा परतावा वजावट करर्णेबाबत निव�ंती करण्याचा अलि6कार होता. अपी�कर्त्या�े केंद्रीय महसू� मंडळाकडेही संपक� सा6ू� अशाच
मुद्द्यांची मागर्णी के�ी. केंद्रीय महसू� मंडळा�े मात्र २४ जू� १९६० च्या पत्राद्वारे या प्रकरर्णात हस्तक्षेप करण्यास �कार निद�ा.
र्त्य�ंतर अपी�कर्त्या�े ७ ऑक्टोबर १९६० रोजी घट�ेच्या क�म २२६ अन्वये यालिचका दा�� के�ी. संबंलि6त तथ्ये आलिर्ण युखिक्तवाद निदल्या�ंतर अपी�कर्त्या�े निव�ंती के�ी की उच्च न्याया�या�े घट�ेच्या क�म 226 अन्वये परमादेश स्वरूपाची रिरट निकंवा रिरट, नि�द—श निकंवा आदेश जारी करावा, उत्तरवादीं�ा कर नि�6ा�रर्ण वर्ष� १९५५ - ५६ साठी देय कराच्या बदल्यात वरी� दुहेरी करसव�त नि�यमां�ुसार अपी�कर्त्या�ा देय परतावा वजावट करण्याचे नि�द—श द्यावेत. असे निदसते की, मध्यंतरी अपी�कर्त्या�े १९४९ - ५० आलिर्ण १९५० - ५१ या कर नि�6ा�रर्ण वर्षाˆसाठी कर भर�ा होता आलिर्ण मूल्यांक� वर्ष� १९५१ - ५२ साठी ८९,०००.५८ रुपयांची मागर्णी स्थनिगत ठेवण्यात आ�ी होती आलिर्ण �ंतर जेंव्हा १९५५ - ५६ चे मूल्यांक� पूर्ण� झा�े, तेंव्हा प्राखिYकर अलि6काऱ्यां�ी मूल्यांक� वर्षा�च्या एकूर्ण मागर्णीपैकी ७९,४३०.१९ रुपये स्थनिगत ठेवण्याचे मान्य के�े होते, केंद्रीय महसू� मंडळाचा नि�र्ण�य होईपयˆत. दुसरी निव�ंती अशी होती की, उच्च न्याया�या�े घट�ेच्या क�म २२६ अन्वये प्रनितर्षे6 �े� निकंवा इतर नि�द—श निकंवा आदेशाच्या स्वरूपात रिरट जारी करू�
उत्तरवादी, र्त्यंचे सहकारी, �ोकर आलिर्ण प्रनितनि�6ी यां�ा यालिचकाकर्त्य�कडू� कर नि�6ा�रर्ण वर्ष� १९५५ - ५६ साठी देय कराची मागर्णी करण्यास निकंवा वसू� करण्यास प्रनितबं6ीत करण्यात यावे, आ6ी वरी� दुहेरी करसव�त नि�यमां�ुसार यालिचकाकर्त्या�ा देय परतावा र्त्य कराच्या बदल्यात वजावट केल्यालिशवाय. आयुक्तांचा २३ ऑगस्ट १९५८ रोजीचा आदेश आलिर्ण केंद्रीय महसू� मंडळाचा ३१ निडसेंबर १९५८ चा आदेश रद्द करण्याची कोर्णतीही निव�ंती करण्यात आ�ी �सल्याचे �क्षात येते. अपी�कर्त्य�चे निवद्वा� वकी� श्री. एस. पी. मेहता यां�ी उच्च न्याया�यासमोर असा युखिक्तवाद के�ा होता की, अपी�कत— आयकर निवभागाच्या परताव्यासाठीचा अज� �ामंजूर के�ेल्या आदेशा�ा आव्हा� देत �ाहीत परंतु वजावट करण्याचा अज� फेटाळू� �ावत र्त्यं�ी निद�ेल्या आदेशां�ा आव्हा� देत होते.
म अपी�कर्त्य�चे निवद्वा� वकी� निवश्व�ार्थ सास्त्री यां�ी प्निव�ंती के�ी की भारतीय राज्य नि�यम, १९३९ च्या नि�यम ५ चे पा�� करर्णे भौनितकदृष्ट्या अशक्य आहे, नि�यम ५ �ागू के�ा �ाही आलिर्ण ा परिरर्णामी नि�यम ५ मध्ये काहीही निवरुद्ध अस�े तरीही अपी�कर्त्या�लिमळर्णारा परतावा देय आहे. पर्ण नि�यम ५ चा अंम� अलि6काऱ्यां�ी योग्य की चुकीचा के�ा, या प्रश्नात आपर्ण जाऊ शकत �ाही. निद�ांक
२३ ऑगस्ट १९५८ आलिर्ण ३१ निडसेंबर १९५८ रोजीच्या आदेशां�ा या
कारवाईत आव्हा�ीत करता येर्णार �ाही. र्त्यमुळे ते आदेश वै6रिरर्त्यदेण्यात आ�े, या आ6ारे आपर्ण पुढे जाय�ा हवे. या प्रकरर्णाच्या परिरखिस्थतीत नि�यम ५ �ागू होते, असे प्राखिYकर अलि6काऱ्यांचे मत योग्य होते की �ाही, याबाबत आम्ही कोर्णतेही मत व्यक्त करत �ाही.
हे आपल्या�ा क�म ४९ ई च्या रच�ेकडे घेऊ� जाते. क�म ४९ ई मध्ये असे म्हट�े आहे :
"४९ ई देय अस�ेल्या कराच्या बदल्यात परताव्याची रक्कम
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28 , 1959 को, आय-1949-50, 1950-51 और 1951-52 केअगस्तकर अधि�कारी ने कर मिन�ा रर्ण वर्ष 29 4 ,संबं� �ें अधि�मिनय� की �ारा के त�त �ांग के तीन नोमिटस मिनग त मिकए। इसके बाद अपी�कता ने सिसतंबर
1959 को एक पत्र लि�खकर आयकर अधि�कारी उक्त �ांगो के मिवरूध्द उस रिरफंड को �ुजरा करेने �ेतु अनुरो�(दो�रा करा�ान रा�त) (सी�ोन) , 1942 49 ए औरमिकया सिजसके लि�ए अपी�कता आयकर मिनय�सपमिpत �ारा 48 , 1942-43, 1943-44 और 1944-45 ,के प्राव�ानों के अनुसारसी�ोन से संबंधि�त �ूhयांकन वर्ष के संबं� �ें1947-48 और 1949-50 और कोh�ापुर और कपूरर्थ�ा से संबंधि�त �ूhयांकन वर्ष के संबं� �ें �कदार र्था। इस, पत्र �ें अपी�कता ने अपने अनुरो� के स�र्थ न �ें तक मिदये। संक्षेप �ेंतक य� र्था मिक यद्यमिप उन रिरफंड का दावा, करने वा�े आवेदन मिन�ा रिरत स�य सी�ा के बाद प्रस्तुत मिकए गए र्थेमिफर भी अपी�कता के पास अभी भी �ारा49 ई के प्राव�ानों के अनुसार अधि�कार र्था की व� आयकर अधि�कारी से अपी�कता पर आयकर अधि�कारीद्वारा उpाई गई कर �ांगों के मिवरुद्ध अपी�कता को देय पाए गए रिरफंड �ुजरा करने के लि�ए आग्र� करे।, अपी�कता ने इसी तर� के हिंबदुओं का आग्र� करते �ुए केंद्रीय राजस्व बोड से भी संपक मिकया। यद्यमिपकेंद्रीय24 जून, 1960 राजस्व बोड ने को अपने पत्र द्वारा इस �ा��े �ें �स्तक्षेप करने से इनकार कर मिदया।
इसके बाद अपी�कता ने 7 अक्टूबर, 1960 को संमिव�ान के अनुच्छेद 226 के त�त एक याधिचका दायर/द�ी� देने के बाद, की। प्रासंमिगक तथ्य और तक अपी�कता ने प्रार्थ ना मिक मिक उच्च न्याया�य पर�ादेश की226 प्रकृधित �ें एक रिरट अर्थवा रिरट मिनदsश या आदेश संमिव�ान के अनच्छेद के त�त जारी करने की कृपा करे मिक1955-56 उत्तरदाताओं को �ूhयांकन वर्ष के लि�ए उसके द्वारा देय कर के मिवरुद्ध उपरोक्त दो�रे करा�ान रा�तमिनय�ों के त�त याधिचकाकता को देय रिरफंड को �ुजरा मिकया जावे। ऐसा प्रतीत �ोता �ै मिक इस बीच याधिचकाकता 1949- 50 और 1950-51 1951-52 केने �ूhयांकन वर्ष के लि�ए कर का भुगतान मिकया र्था और मिन�ा रर्ण वर्ष 89,000.58 , 1955-56 लि�ए रुपये की �ांग को स्र्थमिगत रखा गया र्थाऔर बाद �ें जब के लि�ए �ूhयांकन पूरा �ोगया, 1955-56 79,430.19 , तो आयकर अधि�कारी ने �ूhयांकन वर्ष से संबंधि�त कु� �ांग �ें से रुपयेकेंद्रीयराजस्व बोड का मिनर्ण य आने तक स्र्थमिगत रखने पर स��त �ुए। दूसरी प्रार्थ ना य� र्थी मिक उच्च न्याया�य मिनर्षे�, 226 ,पकृधित की रिरटअन्य मिनदsश अर्थवा आदेश संमिव�ान की �ारा के त�त जारी करने की कृपा करे मिक, 1955-56 उत्तरदाता उनके अधि�कारीसेवकों और एजेंट को याधिचकाकता से �ूhयांकन वर्ष के लि�ए देय कर की, �ांग अर्थवा वसू�ी या �ांगयाची को दो�रे आयकर रा�त �ें प्राप्त �नवापसी को स�ायोजन मिकए मिबना करने से, 23 1958, मिनर्षेधि�त करें। य� ध्यान मिदया जाएगा मिक आयुक्त के आदेशमिदनांक अगस्त और केंद्रीय राजस्व बोड 31 , 1958 के आदेश मिदनांक मिदसंबरको रद्द करने के लि�ए कोई प्रार्थ ना न�ीं की गई र्थी।अपी�कता के मिवद्वान.पी. , अधि�वक्ता श्री एस�े�ता द्वाराउच्च न्याया�य के स�क्ष तक मिदया गया मिक अपी�कता आयकर अधि�कारी के, रिरफंड के लि�ए उसके आवेदन को खारिरज करने के आदेश को चुनौती न�ीं दे र�ा र्थाबत्विhक केव� उनके द्वारा�ुजरा के आवेदन को खारिरज करने के आदेश को चुनौती दे र�ा र्था।
,अपी�कता के मिवद्वान अधि�वक्ता श्री मिवश्वनार्थ शास्त्री ने प्�तया आग्र� मिकया मिक भारतीय राज्य मिनय�1939 5 , 5 5 केका मिनय� का अनुपा�न भौधितक रूप से संभव न�ी �ैमिनय� �ागू न�ी �ोता �ै और मिफर मिनय� �ोते �ुए भी अपी�कता को देय �नवापसी �ेतु मिनवेदन मिकया �ेमिकन �� इस सवा� पर न�ीं जा सकते मिक क्या5 23 मिनय� आयकर अधि�कारिरयों द्वारा स�ी या ग�त तरीके से �ागू मिकया गया र्था। इन काय वा�ी �ें अगस्त1958 और 31 1958 , मिदसम्बर के आदेशों पर आ�ात न�ीं मिकया जा सकता। इसलि�ए��ें इस आ�ार पर अग्रसर�ोना चामि�ए मिक वे आदेश वै� रूप से पारिरत मिकए गए र्थे। �� इस पर कोई राय व्यक्त न�ीं कर र�ें �ैं मिक क्या5 आयकर अधि�कारिरयों का मिवचार मिक मिनय� �ा��े की परिरत्विस्र्थधितयों �ें �ागू र्था या न�ीं।
य� ��ें �ारा 49 ई के गpन की ओर �े जाता �ै। �ारा 49 ई इस प्रकार �ै:
49E /: देय शेर्ष टैक्स के लिख�ाफ रिरफंड की राशिश से स�ायोसिजत�ुजरा करने की शमिक्तज�ाँ इस अधि�मिनय� के, अपी�ीय स�ायकप्राव�ानों �ें से मिकसी के अ�ीन मिकसी व्यमिक्त को कोई रिरफंड देय �ै आयकर अधि�कारीआयुक्त या आयुक्त जैसी की त्विस्र्थधित �ो रिरफंड का भुगतान के बद�े �ें वापस की जोने वा�ी राशिश या उसके मिकसी
भी भाग से कर, , , ब्याज या जु�ा ना यमिद कोई के मिवरूद्ध स�योजन कर सकते �ैसिजसे उस व्यमिक्त द्वारा देय �ैसिजसेभुगतान मिकया जाना �ै।
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A
B
On August 28, 1959, the Income-Tax Officer issued three notices of demand under s. 29 of the Act in respect of the Assess-1 ment years 1949-50, 1950-51 and 1951-52. The appellant then wrote a letter dated September 4, 1959, requesting the Income-Tax Officer to set off the refunds to which the appellant was entitled pursuant to the provisions of Income-Tax (Double Taxation Relief) (Ceylon) Rules, 1942, and read with the provisions of ss. 49A and 48 of the Income-Tax Act, in respect G of the assessment years 1942-43, 1943-44 and 1944-45, relating to Ceylon, and the assessment year 1947-48 and 1949-50 relat-ing to Kolhapur and Kapurthala, against the said demands. In this letter the appellant gave arguments in support of its request. In short, the argument was that although the applications claim-ing those refunds were submitted beyond the prescribed time H limit, nevertheless the appellant had a right still, pursuant to the the provisions of s. 49E, to call upon the Income-Tax Officer to
•
A set off the refunds found to be due to the appellant against the tax demands raised by the Income-Tax Officer on the appellant. The appellant also approached the Central Board of Revenue, urging similar points. The Central Board of Revenue, however, by its letter dated June 24, 1960, declined to interfere in the matter.
B
The appellant then on October 7, 1960, filed a petition under Art. 226 of the Constitution. After giving the relevant facts and submissions, the appellant prayed that the High Court be pleased to issue a writ in the nature of Mandamus or a writ, direction or order under Art. 226 of the Constitution, directing C the respondents to set off the refunds due to the petitioner under the aforesaid double taxation relief rules against the tax payable by it for the assessment year 1955-56. It appears that in the mean-time the petitioner had paid tax for the assessment years 1949-50 and 1950-51, and the demand for Rs. 89,000.58 for the ,o assessment year 1951-52 was kept in abeyance, .and later when the assessment for 1955-56 was completed, fue Income-Tax Officers had agreed to keep in abeyance Rs. 79,430.19 out of the total demand relating to the assessment year 1955-56, till the decision of the Central Board of Revenue. The second prayer was that the High Court be pleased to issue writs in the Ii: nature of Prohibition or other direction or order under Art. 226 of the Constitution pr
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