Case LawSupreme Court › [2019] 6 S.C.R. 188

Pr. Commissioner Of Income Tax Central 2 v. M/S A.a. Estate Pvt. Ltd

Supreme Court [2019] 6 S.C.R. 188 16 Apr 2019 In favour of: Unclear
Forum / Bench
Supreme Court
Parties
Pr. Commissioner Of Income Tax Central 2 v. M/S A.a. Estate Pvt. Ltd
Date of order
16 Apr 2019
Assessment year(s)
Outcome
Other

The order — as passed by the Supreme Court

Case summary

In Pr. Commissioner Of Income Tax Central 2 v. M/S A.a. Estate Pvt. Ltd, the Supreme Court (2019) decided the matter.

Issue: So, the short question, which arises for consideration in thisappeal, is whether High Court was justified in dismissing the appeal filedby the Commissioner of Income Tax (appellant herein).

Decision: Having heard the learned counsel for the parties and on perusalof the record of the case and the written submissions filed by the learnedcounsel, we are inclined to allow this appeal and while setting aside the H impugned order, remand the case to the High Court for deciding theappeal afresh.

Summary auto-generated from the order below — read the full judgment for the complete reasoning.

Sections referenced in this judgment

Case: PR. COMMISSIONER OF INCOME TAX CENTRAL 2 versus M/S A.A. ESTATE PVT. LTD. [[2019] 6 S.C.R. 188] (2019) Section: ISSUES 188 SUPREME COURT REPORTS [2019] 6 S.C.R. APR. COMMISSIONER OF INCOME TAX CENTRAL 2 v. M/S A.A. ESTATE PVT. LTD. (Civil Appeal No. 3968 of 2019) B APRIL 16, 2019 [ABHAY MANOHAR SAPRE AND DINESH MAHESHWARI, JJ.] Income Tax Act, 1961: ss. 260-A, 260-A(3), 260-A(4) – AppealCto High Court – Formulation of substantial question of law – Onfacts, non-formulation of any substantial question of law by theHigh Court as required to be framed u/s.260-A – Held: Questionsframed by the High Court were not as was required to be framed u/s 260-A(3) for hearing the appeal but were the questions urged bythe appellant – There lies a distinction between the questionsDproposed by the appellant for admission of the appeal and thequestions framed by the Court – Questions, which are proposed bythe appellant, fall u/s 260-A(2)(c) whereas the questions framed bythe High Court fall u/s 260-A(3) – Appeal is heard on merits onlyon the questions framed by the High Court u/s. 260-A(3) as providedEu/s. 260-A (4) – Further, if the High Court was of the view that theappeal did not involve any substantial question of law, it shouldhave recorded a categorical finding to that effect and dismissed theappeal in limine – However, the High Court without admitting theappeal and framing any question of law, issued notice of appeal tothe assessee, heard both the parties on the questions urged by theFappellant and dismissed it – Thus, the High Court did not decidethe appeal in conformity with the mandatory procedure prescribedin s.260-A – High Court should have seen that the substantialquestions of law did arise in the appeal for being answered ontheir respective merits – Matter remanded to the High Court to answerGthe questions framed by this Court u/s. 260-A(3) of the Act.CIVIL APPELLATE JURISDICTION : Civil Appeal No. 3968of 2019. From the Judgment and Order dated 09.01.2017 of the HighCourt of Judicature at Bombay in Income Tax Appeal No. 1239 of 2014. H H. R. Rao, P. V. Yogeswaran, Mrs.Anil Katiyar, Advs. for theAppellant. Salil Kapoor, Sumit Lalchandani, Praveen Swarup, Advs. for theRespondent. The Judgment of the Court was delivered by ABHAY MANOHAR SAPRE, J. 1. Leave granted. 2. This appeal is filed against the final judgment and order dated09.01.2017 passed by the High Court of judicature at Bombay in ITANo.1239 of 2014 whereby the High Court dismissed the appeal of theRevenue-Commissioner of Income Tax-Mumbai(appellant herein). 3. A few facts need mention hereinbelow for the disposal of thisappeal, which involves a short point. 4. The appellant is the Revenue-Commissioner of Income Tax,Mumbai, whereas the respondent is an assessee. 5. The respondent-assessee is a Company engaged in the businessof development and building of properties. The dispute relates to theassessment year 2008-09. 6. On 24.12.2009, the Assessing Officer (for short, “the AO”)completed the assessment under Section 143(3) read with Section 153Aof the Income Tax Act, 1961 (hereinafter referred to as “the Act”) anddetermined the total income at Rs.7,77,49,790/-. 7. On 22.09.2010, the AO issued a notice under Section 148 ofthe Act seeking therein to re-open the assessment of the respondent-assessee which was made on 24.12.2009. This notice was issued by theAO on the basis of information received from ADIT (investigation)Unit II (2). 8. By this notice, the AO proposed to make an addition ofRs.1,70,94,000/- towards unaccounted sale proceeds alleged to havebeen made by the respondent-assessee in the assessment year in question(2008-2009) because, in his opinion, it was in the nature of escapedassessment. 9. The AO proposed this addition on the basis of one document(Annexure–AB-1), which was seized by the Revenue Department in A B C D E F G H Atheir search operation carried on 30.11.2007 in the business premises ofanother assessee by name-M/s Ashok Buildcom Ltd. Case: PR. COMMISSIONER OF INCOME TAX CENTRAL 2 versus M/S A.A. ESTATE PVT. LTD. [[2019] 6 S.C.R. 188] (2019) [2019] 6 एस.सी.आर. 188 पो0 कमिशर ऑफ इनकम टैकस सेनट्ल 2 बनाम म0 ए.ए. इसटेट पा. .लि (ल अपील सं0-3968/2019) अपैल 16, 2019 सिवि [अभय मनोहर सपे एवं नश माहेशरी,दि नयायाधीशगण ] , 1961: धारा 260- A, 260-A(3) 260-A (4)--आयकर अधिनियमउच्च न्यायालय में अपीलविधि के सारवान-, प्रश्न को विनिर्मित करनातथ्य के अनुसारउच्च न्यायालय द्वारा विधि के सारवान प्रश्न को विनिर्मित नहीं किया260-A -गया जैसा कि अन्तर्गत धारा अपेक्षा करता हैअवधारित किया गयाः उच्च न्यायालय द्वारा जो प्रश्नविरचित किये गये थे वह उस प्रकार नहीं थे जिस प्रकार अन्तर्गत धारा 260-A(3) अपील की सुनवाई हेतु-विरचित करना आवश्यक था अपितु वो प्रश्न थे जिनको अपीलार्थी द्वारा बताया गयायहाॅ पर जो प्रश्नअपीलार्थी द्वारा अपील के अंगीकरण किये जाने हेतु प्रस्तावित किये गये हों और वह प्रश्न जिनको न्यायालय, -को विरचित करना चाहिएउनके मध्य अन्तर हैप्रश्न जिनको अपीलार्थी द्वारा प्रस्तावित किया गया वह260-A(2)(c) 260-A(3) अन्तर्गत धारा आते हैं जबकि उच्च न्यायालय द्वारा विरचित प्रश्न अन्तर्गत धारा में-आते हैंअपील को गुणदोष के आधार पर उन्हीं प्रश्नों पर सुना जाता है जिन्हें उच्च न्यायालय द्वारा अन्तर्गतधारा 260-A(3) 260-A (4) , , जैसा कि धारा उपबंधित करती हैविरचित किया होआगे अगर उच्च न्यायालयइस दृष्टिकोण का था कि अपील में कोई भी विधि का सारवान प्रश्न सम्मिलित नहीं हुआ है तो उन्हें सुस्पष्ट, (in limin) रूप से अपने निष्कर्ष में देना चाहिए थापरिणामस्वरूप अपील को दहलीज पर ही निरस्त कर-देना चाहिए थाजबकि उच्च न्यायालय द्वारा बिना अपील को अंगीकृत किये और विधि के प्रश्न को विरचित, , कियेअपील की नोटिस निर्धारिती को जारी कर दी गयीअपीलार्थी द्वारा बताये गये प्रश्नों पर दोनों पक्षकारों-260-A कीको सुना गया और अपील निरस्त कर दी गयीइस प्रकार उच्च न्यायालय द्वारा अपील को धारा -आज्ञात्मक प्रक्रिया के अनुरूप निर्णीत नहीं किया गयाउच्च न्यायालय को यह देखना चाहिए था कि विधि का-सारवान प्रश्न अपील में उठा था जिसका उत्तर उनके गुणदोष के आधार पर दिया जातामामला उन प्रश्नों का260-A(3) , उत्तर देने के लिए जिन्हें इस न्यायालय द्वारा अन्तर्गत धारा विरचित किया गयाउनके निस्तारणहेतु मामले को उच्च न्यायालय को प्रतिप्रेषित किया गया। : 0-3968/2019.सिविल अपीलेट क्षेत्राधिकारसिविल अपील सं आयकर अपील सं0-1239/2014 उच्च न्यायालय बाम्बे के द्वारा पारित निर्णय व आदेश दिनांकित09-01-2017 से उद्धृत हुई है। एच.आर. राव, पी.वी. , 0 , योगेश्वरनमिअनिल कटियारअधिवक्तागण अपीलार्थी के लिए। , , , सलिल कपूरसुमित लालचन्दानीप्रवीन स्वरूपअधिवक्तागण प्रत्यर्थी के लिए। न्यायालय का निर्णय सुनाया गया द्वारा , अभय मनोहर सप्रेन्यायाधीश 1. अनुमति दी गयी। 2. 09-01-2017 जो ITA सं0-1239/2014 केयह अपील बाम्बे उच्च न्यायालय के निर्णय व आदेश दिनांकित , -() केविरूद्ध प्रस्तुत की गयीजिसके द्वारा उच्च न्यायालय ने राजस्व आयुक्त आयकरमुम्बई यहाॅ पर अपीलार्थीअपील को निरस्त कर दिया। 3. , इस अपील के निस्तारण के लिए कुछ तथ्यों का उल्लेख करने की आवश्यकता हैजिसमें एक लघु बिन्दुशामिल है। 4. , अपीलार्थी राजस्व आयुक्त आयकरमुम्बई है जबकि प्रत्यर्थी निर्धारिती। 5. -, प्रत्यर्थीनिर्धारिती एक कम्पनी हैजो सम्पत्ति के विकास व निर्माण का व्यवसाय करती है। यह विवाद सन्2008-09 के निर्धारण से सम्बन्धित है। 6. 24-12-2009 (, ’’ए0 ओ0’’) 143 (3) दिनांक को निर्धारण अधिकारी लघु मेंद्वारा अन्तर्गत धारा सपठितधारा 153, 1961 () ए आयकर अधिनियमतत्पश्चात् ’’अधिनियम’’ से सम्बोधित किया जाएगानिर्धारण पूर्ण0-7,77,49,790/- किया गया और सम्पूर्ण आय रूअभिनिर्धारित की गयी। 7. दिनांक 22-09-2010 को ए0 ओ0 द्वारा अधिनियम की धारा 148 के अन्तर्गत प्रत्यर्थी-निर्धारिती को-, 24-12-2009नोटिस प्रत्यर्थीनिर्धारिती के निर्धारण को पुनः खोलने हेतु जारी किया गयाजो पूर्व में दिनांक 0 ओ0 ADIT (Investigation) Unit II (2). को किया गया था। यह नोटिस एद्वारा द्वारा दी गयी सूचना केआधार पर जारी की गयी थी। 8. , ए0 ओ0 1,70,94,000/-0, इस नोटिस द्वाराद्वारा प्रस्तावित किया गया कि रूजो कथित रूप से बेहिसाब-(2008-2009) , बिक्री द्वारा प्रत्यर्थीनिर्धारिती द्वारा प्रश्नगत निर्धारण वर्ष में कियाक्योंकि उनकी राय मेंनिर्धारण से छूट गये निर्धारण की प्रकृति का था। 9. ए0 ओ0 (-एबी-1) द्वारा इस अतिरिक्त धनराशि को एक अभिलेख एनेक्जरके आधार पर जोड़ना प्रस्तावित, 0 0 किया गया थाजो राजस्व विभाग द्वारा अन्य निर्धारिती मेअशोक बिल्डकाॅम लिके परिसरों की तलाशी30-11-2007 अभियान के दौरान दिनांक को हाथ में आया था। Case: PR. COMMISSIONER OF INCOME TAX CENTRAL 2 versus M/S A.A. ESTATE PVT. LTD. [[2019] 6 S.C.R. 188] (2019) 2ਪੀ.ਆਰ. ਇਨਕਮ ਟੈਕਸ ਸੈਂਟਰਲ ਦੇ ਕਮਮਸ਼ਨਰ ਬਨਾਮ . ਮ/ਸਏ.ਏ. ਅਸਟੇਟ. ਮਲਮਮਟੇਡਮਨਿੱਜੀ(2019 ਦੀ ਮਸਵਲ ਅਪੀਲ ਨੰ. 3968) 16 ਅਪਰੈਲ, 2019 [ਅਭੈ ਮਨੋਹਰ ਸਪਰੇ ਅਤੇ , ਜੇ.ਜੇ.]ਮਦਨੇਸ਼ ਮਹੇਸ਼ਵਰੀ ਇਨਕਮ ਟੈਕਸ ਐਕਟ, 1961: ਐਸ.ਐਸ. 260-ਏ, 260-ਏ(3), 260-ਏ(4) - 'ਤੇ, ਹਾਈ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨ ੰ ਅਪੀਲ - ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਮਹੱਤਵਪ ਰਨ ਸਵਾਲ ਦਾ ਗਠਨ - ਤੱਥਾਂ ਕੋਰਟ ਦੁਆਰਾ ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਮਕਸੇ ਵੀ ਮਹੱਤਵਪ ਰਨ ਸਵਾਲ ਦਾ ਗਠਨ ਨਾ ਕਰਨਾ ਫਰੇਮਡ u/s.260-ਏ - ਆਯੋਜਤ: ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਦੁਆਰਾ ਬਣਾਏ ਗਏ ਸਵਾਲਾਂ ਨ ੰ ਅਪੀਲ ਦੀ ਸੁਣਵਾਈ ਲਈ 260-ਏ(3) ਦੇ ਤਮਹਤ ਬਣਾਏ ਜਾਣ ਦੀ ਲੋੜ ਨਹੀਂ ਸੀ ਪਰ ਕੀ ਅਪੀਲਕਰਤਾ ਦੁਆਰਾ ਪੁੱਛੇ ਗਏ ਸਵਾਲ ਸਨ - ਇੱਕ ਹੈ ਅਪੀਲ ਦਾਖਲ ਕਰਨ ਲਈ ਅਪੀਲਕਰਤਾ ਦੁਆਰਾ ਪਰਸਤਾਮਵਤ ਸਵਾਲਾਂ ਅਤੇ ਅਦਾਲਤ ਦੁਆਰਾ ਬਣਾਏ ਗਏ ਸਵਾਲਾਂ ਮਵਚਕਾਰ ਅੰਤਰ - ਅਪੀਲਕਰਤਾ ਦੁਆਰਾ ਪਰਸਤਾਮਵਤ ਸਵਾਲ, 260-ਏ(2)(c) ਦੇ ਅਧੀਨ ਆਉਂਦੇ ਹਨ ਜਦੋਂ ਮਕ 260-ਏ(3) - ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਦੁਆਰਾ ਬਣਾਏ ਉੱਚ ਦੁਆਰਾ ਬਣਾਏ ਗਏ ਸਵਾਲ ਕੋਰਟ ਫਾਲ 'ਤੇ ਹੀ ਮੈਮਰਟ '260-ਏ(3) ਗਏ ਸਵਾਲਾਂ ਤੇ ਸੁਣਵਾਈ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਮਜਵੇਂ ਮਕ ਪਰਦਾਨ ਕੀਤਾ ਮਗਆ ਹੈ। 260-ਏ (4) - , ਜੇਕਰ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਦਾ ਮਵਚਾਰ ਸੀ ਮਕ ਇਸ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ, ਅਪੀਲ ਮਵੱਚ ਕਾਨ ੰਨ ਦਾ ਕੋਈ ਮਹੱਤਵਪ ਰਨ ਸਵਾਲ ਸ਼ਾਮਲ ਨਹੀਂ ਸੀਤਾਂ ਉਸਨ ੰ ਇਸ ਪਰਭਾਵ ਲਈ ਇੱਕ ਸਪੱਸ਼ਟ ਖੋਜ ਦਰਜ ਕਰਨੀ ਚਾਹੀਦੀ ਸੀ ਅਤੇ ਅਪੀਲ ਨ ੰ ਸੀਮਾ ਮਵੱਚ ਖਾਰਜ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਸੀ - ਹਾਲਾਂਮਕ, ਹਾਈ ਅਦਾਲਤ ਨੇ ਅਪੀਲ ਨ ੰ ਸਵੀਕਾਰ ਕੀਤੇ , ਮਬਨਾਂ ਅਤੇ ਕਾਨ ੰਨ ਦਾ ਕੋਈ ਵੀ ਸਵਾਲ ਮਤਆਰ ਕੀਤੇ ਮਬਨਾਂਮੁਲਾਂਕਣਕਰਤਾ ਨ ੰ ਅਪੀਲ ਦਾ ਨੋਮਟਸ ਜਾਰੀ ਕੀਤਾ, 'ਅਪੀਲਕਰਤਾ ਦੁਆਰਾ ਪੁੱਛੇ ਗਏ ਸਵਾਲਾਂ ਤੇ ਦੋਵਾਂ ਮਧਰਾਂ ਨ ੰ ਸੁਮਣਆ , ਅਤੇ ਇਸ ਨ ੰ ਖਾਰਜ ਕਰ ਮਦੱਤਾ - ਇਸ ਤਰਹਾਂਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ ਲਾਜ਼ਮੀ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ ਅਪੀਲ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ। s.260-ਏ ਮਵੱਚ ਮਨਰਧਾਰਤ ਪਰਮਕਮਰਆ - ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨ ੰ ਇਹ ਦੇਖਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਸੀ ਮਕ ਅਪੀਲ ਮਵੱਚ ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਮਹੱਤਵਪ ਰਨ ਸਵਾਲ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਸਬੰਧਤ 'ਗੁਣਾਂ ਦੇ ਆਧਾਰ ਤੇ ਜਵਾਬ ਮਦੱਤੇ ਜਾਣ ਲਈ ਪੈਦਾ ਹੋਏ - ਮਾਮਲਾ ਇਸ ਅਦਾਲਤ ਦੁਆਰਾ ਬਣਾਏ ਗਏ ਸਵਾਲਾਂ ਦੇ ਜਵਾਬ ਦੇਣ ਲਈ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨ ੰ ਮਰਮਾਂਡ ਮਦੱਤਾ ਮਗਆ . ਐਕਟ ਦਾ 260-ਏ(3)। ਮਸਵਲ ਅਪੀਲੀ ਅਮਧਕਾਰ ਖੇਤਰ: 2019 ਦੀ ਮਸਵਲ ਅਪੀਲ ਨੰਬਰ 3968। 2014 ਦੀ ਇਨਕਮ ਟੈਕਸ ਅਪੀਲ ਨੰਬਰ 1239 ਮਵੱਚ ਬੰਬਈ ਦੇ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਆਫ ਮਨਆਂਇਕ ਦੇ ਮਮਤੀ 09.01.2017 ।ਦੇ ਫੈਸਲੇ ਅਤੇ ਆਦੇਸ਼ ਤੋਂ। ਅਪੀਲਕਰਤਾ ਲਈਸਮਲਲ ਕਪ ਰ, ਸੁਮਮਤ ਲਾਲਚੰਦਾਨੀ, ਪਰਵੀਨ ਸਵਰ ਪ, ਐਡਵ. ਜਵਾਬਦੇਹ ਲਈ.ਵੱਲੋਂ ਅਦਾਲਤ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਸੁਣਾਇਆ ਮਗਆ ਅਭੈ ਮਨੋਹਰ ਸਪਰੇ, ਜੇ. 1. ਛੁੱਟੀ ਮਦੱਤੀ ਗਈ। 2. ਇਹ ਅਪੀਲ 2014 ਦੇ ਆਈ.ਟੀ.ਏ. ਨੰਬਰ 1239 ਮਵੱਚ ਬੰਬਈ ਮਵਖੇ ਮਨਆਂਇਕ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਦੁਆਰਾ ਪਾਸ ਕੀਤੇ ਗਏ 09.01.2017 ਦੇ ਅੰਤਮ ਫੈਸਲੇ ਅਤੇ ਆਦੇਸ਼ ਦੇ ਮਵਰੁੱਧ ਦਾਇਰ ਕੀਤੀ ਗਈ ਹੈ ਮਜਸ ਮਵੱਚ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ ਆਮਦਨ ਕਰ-ਮੁੰਬਈ ਦੇ ਮਾਲ-ਕਮਮਸ਼ਨਰ ਦੀ ਅਪੀਲ ਨ ੰ ਖਾਰਜ ਕਰ ਮਦੱਤਾ ਹੈ। ਇੱਥੇ ਅਪੀਲਕਰਤਾ) 3. , ਇਸ ਅਪੀਲ ਦੇ ਮਨਪਟਾਰੇ ਲਈ ਹੇਠਾਂ ਕੁਝ ਤੱਥਾਂ ਦਾ ਮਜ਼ਕਰ ਕਰਨਾ ਜ਼ਰ ਰੀ ਹੈਮਜਸ ਮਵੱਚ ਇੱਕ ਛੋਟਾ ਨੁਕਤਾ ਸ਼ਾਮਲ ਹੈ। 4. ਅਪੀਲਕਰਤਾ ਆਮਦਨ ਕਰ, , ਜਦਮਕ ਮੁੰਬਈ ਦਾ ਮਾਲ-ਕਮਮਸ਼ਨਰ ਹੈਉੱਤਰਦਾਤਾ ਇੱਕ ਮੁਲਾਂਕਣ ਹੈ। 5. ਉੱਤਰਦਾਤਾ-ਮੁਲਾਂਕਣ ਇੱਕ ਕੰਪਨੀ ਹੈ ਜੋ ਸੰਪਤੀਆਂ ਦੇ ਮਵਕਾਸ ਅਤੇ ਮਨਰਮਾਣ ਦੇ ਕਾਰੋਬਾਰ ਮਵੱਚ ਲੱਗੀ ਹੋਈ ਹੈ। ਮਵਵਾਦ ਮੁਲਾਂਕਣ ਸਾਲ 2008-09 ਨਾਲ ਸਬੰਧਤ ਹੈ। 6. 24.12.2009 ਨ ੰ, ਮੁਲਾਂਕਣ ਅਮਧਕਾਰੀ (ਛੋਟੇ ਤੌਰ 'ਤੇ, " ਏਓ") ਨੇ ਆਮਦਨ ਕਰ ਐਕਟ, 1961 ਦੀ ਧਾਰਾ 153 ਏਦੇ ਨਾਲ ਪੜਹੀ ਗਈ ਧਾਰਾ 143(3) ਦੇ ਤਮਹਤ ਮੁਲਾਂਕਣ ਪ ਰਾ ਕੀਤਾ (ਇਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ "ਐਕਟ" ਵਜੋਂ ਜਾਮਣਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ) ਅਤੇ ਨੇ ਕੁੱਲ ਆਮਦਨ 7,77,49,790/- ਰੁਪਏ ਮਨਰਧਾਰਤ ਕੀਤੀ। 7. 22.09.2010 ਨ ੰ, ਮੁਲਾਂਕਣ ਅਮਧਕਾਰੀਨੇ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 148 ਦੇ ਤਮਹਤ ਇੱਕ ਨੋਮਟਸ ਜਾਰੀ ਕੀਤਾ ਮਜਸ ਮਵੱਚ ਜਵਾਬਦਾਤਾ ਦੇ ਮੁਲਾਂਕਣ ਨ ੰ ਦੁਬਾਰਾ ਖੋਲਹਣ ਦੀ ਮੰਗ ਕੀਤੀ ਗਈ ਸੀ ਜੋ ਮਕ 24.12.2009 ਨ ੰ ਕੀਤਾ ਮਗਆ ਸੀ। ਇਹ ਨੋਮਟਸ ਏਡੀਆਈਟੀ II (2) 'ਤੇ(ਇਨਵੈਸਟੀਗੇਸ਼ਨ) ਯ ਮਨਟ ਤੋਂ ਪਰਾਪਤ ਜਾਣਕਾਰੀ ਦੇ ਆਧਾਰ ਮੁਲਾਂਕਣ ਅਮਧਕਾਰੀ 8. ਇਸ ਨੋਮਟਸ ਦੁਆਰਾ, ਮੁਲਾਂਕਣ ਅਮਧਕਾਰੀਨੇ ਮੁਲਾਂਕਣ ਸਾਲ (2008-2009) 'ਤੇ ਕੀਤੀ ਗਈ ਬੇਮਹਸਾਬ ਮਵਕਰੀ ਮਵੱਚ ਉੱਤਰਦਾਤਾ-ਮੁਲਾਂਕਣ ਦੁਆਰਾ ਕਮਥਤ ਤੌਰ ਕਮਾਈ ਮਵੱਚ 1,70,94,000/- ਰੁਪਏ ਜੋੜਨ ਦਾ ਪਰਸਤਾਵ ਕੀਤਾ ਮਕਉਂਮਕ, ਉਸਦੀ ਰਾਏ ਮਵੱਚ, ਇਹ ਬਚੇ ਹੋਏ ਮੁਲਾਂਕਣ ਦੇ ਸੁਭਾਅ ਮਵੱਚ ਸੀ। 9. 1) ਦੇ ਆਧਾਰ 'ਤੇ ਇਸ ਜੋੜ ਦੀ ਏ.ਓ. ਨੇ ਇੱਕ ਦਸਤਾਵੇਜ਼ (ਅਨੈਕਸਰ-ਏਬੀ-, ਤਜਵੀਜ਼ ਕੀਤੀਮਜਸ ਨ ੰ ਮਾਲ ਮਵਭਾਗ ਦੁਆਰਾ ਜ਼ਬਤ ਕੀਤਾ ਮਗਆ ਸੀ। ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਖੋਜ ਮੁਮਹੰਮ 30.11.2007 / ਦੁਆਰਾ ਨ ੰ ਇੱਕ ਹੋਰ ਮੁਲਾਂਕਣ ਦੇ ਕਾਰੋਬਾਰੀ ਸਥਾਨ ਮਵੱਚ ਨਾਮ-ਮਕੀਤੀ ਗਈ ਸੀ। s ਅਸ਼ੋਕ ਮਬਲਡਕਾਮ ਮਲਮਮਟੇਡ 10. ਦ ਜੇ ਸ਼ਬਦਾਂ ਮਵੱਚ, ਉਪਰੋਕਤ ਰਕਮ ਨ ੰ ਜੋੜਨ ਲਈ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 148 ਦੇ ਤਮਹਤ ਜਵਾਬਦਾਤਾ-ਮੁਲਾਂਕਣਕਰਤਾ ਨ ੰ ਨੋਮਟਸ ਜਾਰੀ ਕਰਨ ਦੀ ਬੁਮਨਆਦ ਦਸਤਾਵੇਜ਼-ਅਨੇਕਸ਼ਰ-ਏਬੀ-1 ਸੀ। 11. 'ਉੱਤਰਦਾਤਾ-ਮੁਲਾਂਕਣਕਰਤਾ ਨੇ ਨੋਮਟਸ ਜਾਰੀ ਕਰਨ ਤੇ ਇਤਰਾਜ਼ ਜਤਾਉਂਦੇ , ; ਹੋਏ ਮਕਹਾ ਮਕ ਪਮਹਲਾਂਨੋਮਟਸ ਜਾਰੀ ਕਰਨ ਲਈ ਕੋਈ ਤੱਥ ਆਧਾਮਰਤ ਆਧਾਰ ਨਹੀਂ ਹੈਦ ਸਰਾ, ਮਕਸੇ ਵੀ "" , ਅਤੇ ਤੀਜਾ, "ਬਚਾਏ ਗਏ ਮੁਲਾਂਕਣਲਈ ਕੋਈ ਕੇਸ ਨਹੀਂ ਹੈਮਵਸ਼ਵਾਸ ਕਰਨ ਦੇ ਕਾਰਨ" ਦਾ ਕੋਈ ਕੇਸ ਨਹੀਂ ਹੈ। Case: PR. COMMISSIONER OF INCOME TAX CENTRAL 2 versus M/S A.A. ESTATE PVT. LTD. [[2019] 6 S.C.R. 188] (2019) 9. The AO proposed this addition on the basis of one document(Annexure–AB-1), which was seized by the Revenue Department in A B C D E F G H Atheir search operation carried on 30.11.2007 in the business premises ofanother assessee by name-M/s Ashok Buildcom Ltd. 10. In other words, the foundation for issuance of notice underSection 148 of the Act to the respondent-assessee for adding theaforementioned sum was the document-Annexure-AB-1. B 11. The respondent-assessee objected to issuance of noticecontending inter alia that first, there is no factual foundation for issue ofnotice; Second, there is no case for any “escaped assessment”, andThird, there is no case to “reason to believe”. 12. By order dated 30.12.2011, the AO overruled the objectionsCraised by the respondent-assessee and passed a re-assessment orderby adding a sum of Rs.1,70,94,000/- in the total income of the respondent-assessee. He held that, in his opinion, it was a case of escaped assessmentand secondly, there was enough material to add the said sum in the totalincome of the respondent-assessee for the assessment year underconsideration.D 13. The respondent-assessee felt aggrieved and filed appealbefore the CIT (appeal). By order dated 21.02.2013, the CIT (appeal)dismissed the appeal and upheld the addition made by the AO. Therespondent-assessee felt aggrieved and filed second appeal before theEITAT. By order dated 05.02.2014, the Tribunal allowed the appeal andset aside the order of the CIT (appeals). 14. The Commissioner of Income Tax felt aggrieved and filedappeal before the High Court under Section 260-A of the Act. Byimpugned order, the High Court dismissed the appeal and affirmed theorder of the Tribunal giving rise to filing of the special leave to appeal byFthe Commissioner of Income Tax in this Court. 15. So, the short question, which arises for consideration in thisappeal, is whether High Court was justified in dismissing the appeal filedby the Commissioner of Income Tax (appellant herein). 16. Heard Mr. H.R. Rao, learned counsel for the appellant andMr. Salil Kapoor, learned counsel for the respondent. G 17. Having heard the learned counsel for the parties and on perusalof the record of the case and the written submissions filed by the learnedcounsel, we are inclined to allow this appeal and while setting aside the H impugned order, remand the case to the High Court for deciding theappeal afresh. 18. In our view, the need to remand the case to the High Courthas occasioned for more than one reason as stated hereinbelow. 19. First, the High Court did not formulate any substantial questionof law as was required to be framed under Section 260-A of the Act. 20. Second, in Para 2 of the impugned order, the High Courtobserved that “Revenue urges following questions of law for ourconsideration”. 21. As is clear from reading of Para 2, the two questions set outin Para 2 were not the questions framed by the High Court as wasrequired to be framed under Section 260-A(3) of the Act for hearing theappeal but were the questions urged by the appellant. 22. In our view, there lies a distinction between the questionsproposed by the appellant for admission of the appeal and the questionsframed by the Court. 23. The questions, which are proposed by the appellant, fall underSection 260-A (2) (c) of the Act whereas the questions framed by theHigh Court fall under Section 260-A (3) of the Act. The appeal is heardon merits only on the questions framed by the High Court under sub-section (3) of Section 260-A of the Act as provided under Section 260-A (4) of the Act. In other words, the appeal is heard only on the questionsframed by the Court. Case: PR. COMMISSIONER OF INCOME TAX CENTRAL 2 versus M/S A.A. ESTATE PVT. LTD. [[2019] 6 S.C.R. 188] (2019) 8. , ए0 ओ0 1,70,94,000/-0, इस नोटिस द्वाराद्वारा प्रस्तावित किया गया कि रूजो कथित रूप से बेहिसाब-(2008-2009) , बिक्री द्वारा प्रत्यर्थीनिर्धारिती द्वारा प्रश्नगत निर्धारण वर्ष में कियाक्योंकि उनकी राय मेंनिर्धारण से छूट गये निर्धारण की प्रकृति का था। 9. ए0 ओ0 (-एबी-1) द्वारा इस अतिरिक्त धनराशि को एक अभिलेख एनेक्जरके आधार पर जोड़ना प्रस्तावित, 0 0 किया गया थाजो राजस्व विभाग द्वारा अन्य निर्धारिती मेअशोक बिल्डकाॅम लिके परिसरों की तलाशी30-11-2007 अभियान के दौरान दिनांक को हाथ में आया था। 10. , 148 -दूसरे शब्दों मेंअधिनियम की अन्तर्गत धारा में प्रत्यर्थीनिर्धारिती को उपरोक्त धनराशि को जोड़नेहेतु नोटिस का आधार अभिलेख एनेक्जर-एबी-1 था। 11. -प्रत्यर्थीनिर्धारित द्वारा जारी नोटिस पर आपत्ति करते हुए अन्य बातों के अलावा कहा गया कि प्रथमतःकोई भी वास्तविक आधार नोटिस जारी करने का नहीं था; दूसरा, यहाॅ पर कोई भी मामला छूटे हुए निर्धारण, का नहीं था और तीसरेऐसा कोई मामला नहीं था जिस पर विश्वास करने का ’’कारण’’ हो। 12. ए0 ओ0 30-12-2011 -द्वारा आदेश दिनांकित द्वारा प्रत्यर्थीनिर्धारिती द्वारा उठायी गयी आपत्तियों को0 1,70,94,000/-0 -नामंजूर कर दिया गया और पुनर्निर्धारण का आदेश मुरूप्रत्यर्थीनिर्धारिती की सकल आयमें जोड़ते हुए किया गया। उनके द्वारा कहा गया कि उनके विचार में यह मामला छूटे हुए निर्धारण का था और -दूसरे पर्याप्त सामग्री प्रत्यर्थीनिर्धारिती के सकल आय में उक्त धनराशि शामिल करने का पर्याप्त आधार उसनिर्धारण विचारणीय वर्ष में था। 13. -.आई.टी. (CIT) (अपील) ल कीप्रत्यर्थीनिर्धारिती द्वारा अपने को व्यथित पाते हुए एक सीके समक्ष दाखिगयी। सी.आई.टी.(अपील) 21-02-2013 द्वारा आदेश दिनांकित द्वारा अपील निरस्त कर दी गयी औरए0 ओ0 -द्वारा किये गये उक्त जोड़ को सही माना। प्रत्यर्थीनिर्धारिती द्वारा उससे व्यथित होकर दूसरी अपीलआई.टी.ए.टी. (ITAT) 05-02-2014 के समक्ष प्रस्तुत की गयी। अधिकरण द्वारा अपने आदेश दिनांकित द्वारा.आई.टी. (CIT) (अपील) अपील को स्वीकार किया गया और सीके आदेश को अपास्त कर दिया गया। 14. आयकर आयुक्त द्वारा अपने को इस आदेश से व्यथित पाते हुए अपील उच्च न्यायालय में अधिनियम कीधारा 260-A के अन्तर्गत प्रस्तुत की गयी। अपने आक्षेपित आदेश द्वारा उच्च न्यायालय ने अपील निरस्त करदी और प्राधिकरण के आदेश को पुष्ट कर दिया जिसके फलस्वरूप आयकर विभाग के आयुक्त द्वारा विशेषअनुमति अपील इस न्यायालय में प्रस्तुत की गयी है। 15. अतः, लघु प्रश्न जो विचारण के लिए इस अपील में उठाया गया है वह यह है कि क्या उच्च न्यायालय द्वाराआयुक्त आयकर विभाग द्वारा प्रस्तुत अपील को निरस्त करने वाला आदेश न्यायानुमत था। 16. .आर. पक्षकारों के विद्वान अधिवक्ता श्री एचराव को व प्रत्यर्थी के विद्वान अधिवक्ता श्री सलिल कपूर कोसुना गया। 17. त कथन,पक्षकारों के विद्वान अधिवक्ता को सुनने व मामले के अभिलेखों के अवलोकन व दाखिल लिखि, जो विद्वान अधिवक्ता द्वारा प्रस्तुत किये गयेके आधार पर हम आक्षेपित आदेश को अपास्त करते हुए इस, अपील को स्वीकार करने के इच्छुक हैंउच्च न्यायालय को मामला नये सिरे से निर्णय हेतु प्रेतिप्रेषित करते हैं। 18. तहमारे विचार में उच्च न्यायालय को मामला प्रेतिप्रेषित करने का कारण एक से ज्यादा हैं जिसे निम्नलिखिरूप से बताया गया है। 19. प्रथमतः उच्च न्यायालय द्वारा विधि के सारवान प्रश्न को विनिर्मित नहीं किया गया जैसा कि विनिर्मित260-A करना अधिनियम की धारा में अपेक्षित था। 20. दूसरे, आक्षेपित आदेश के पैरा 2 में उच्च न्यायालय द्वारा कहा गया है कि ’’राजस्व द्वारा निम्नलिखितवादी के प्रश्नों को हमारे विचारण के लिए बताया गया है’’। 21. 2 2 जैसा कि पैरा को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि जो दो प्रश्न पैरा में दिये गये हैं वह प्रश्न उच्च न्यायालय द्वारा260-A(3) विरचित नहीं किये गये हैं जैसा कि अधिनियम की धारा के अन्तर्गत अपील की सुनवायी हेतु, विरचित करना आवश्यक थापरन्तु वह प्रश्न थे जिन्हें अपीलार्थी द्वारा बताया गया था। 22. , हमारे विचार में यहाॅ पर प्रश्नजो अपील के अंगीकरण हेतु अपीलार्थी द्वारा प्रस्तावित किये गये और जोप्रश्न न्यायालय द्वारा विरचित किये गये उनमें अन्तर है। 23. , , 260-A(2)(c) प्रश्नजो अपीलार्थी द्वारा प्रस्तावित किये गये थेवह अधिनियम की धारा के अन्तर्गत आते260-A(3) हैं जबकि उच्च न्यायालय द्वारा विरचित किये गये प्रश्न अधिनियम की धारा के अन्तर्गत आते हैं। उच्च, न्यायालय द्वारा गुणदोष के आधार पर उन प्रश्नों पर सुनवायी की गयीजो उनके द्वारा अधिनियम की धारा Case: PR. COMMISSIONER OF INCOME TAX CENTRAL 2 versus M/S A.A. ESTATE PVT. LTD. [[2019] 6 S.C.R. 188] (2019) 10. ਦ ਜੇ ਸ਼ਬਦਾਂ ਮਵੱਚ, ਉਪਰੋਕਤ ਰਕਮ ਨ ੰ ਜੋੜਨ ਲਈ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 148 ਦੇ ਤਮਹਤ ਜਵਾਬਦਾਤਾ-ਮੁਲਾਂਕਣਕਰਤਾ ਨ ੰ ਨੋਮਟਸ ਜਾਰੀ ਕਰਨ ਦੀ ਬੁਮਨਆਦ ਦਸਤਾਵੇਜ਼-ਅਨੇਕਸ਼ਰ-ਏਬੀ-1 ਸੀ। 11. 'ਉੱਤਰਦਾਤਾ-ਮੁਲਾਂਕਣਕਰਤਾ ਨੇ ਨੋਮਟਸ ਜਾਰੀ ਕਰਨ ਤੇ ਇਤਰਾਜ਼ ਜਤਾਉਂਦੇ , ; ਹੋਏ ਮਕਹਾ ਮਕ ਪਮਹਲਾਂਨੋਮਟਸ ਜਾਰੀ ਕਰਨ ਲਈ ਕੋਈ ਤੱਥ ਆਧਾਮਰਤ ਆਧਾਰ ਨਹੀਂ ਹੈਦ ਸਰਾ, ਮਕਸੇ ਵੀ "" , ਅਤੇ ਤੀਜਾ, "ਬਚਾਏ ਗਏ ਮੁਲਾਂਕਣਲਈ ਕੋਈ ਕੇਸ ਨਹੀਂ ਹੈਮਵਸ਼ਵਾਸ ਕਰਨ ਦੇ ਕਾਰਨ" ਦਾ ਕੋਈ ਕੇਸ ਨਹੀਂ ਹੈ। 12. ਮਮਤੀ 30.12.2011 ,ਨੇ ਦੇ ਆਦੇਸ਼ ਦੁਆਰਾਮੁਲਾਂਕਣ ਅਮਧਕਾਰੀਉੱਤਰਦਾਤਾ-ਮੁਲਾਂਕਣਕਰਤਾ ਦੁਆਰਾ ਉਠਾਏ ਗਏ ਇਤਰਾਜ਼ਾਂ ਨ ੰ ਰੱਦ ਕਰ ਮਦੱਤਾ ਅਤੇ ਉੱਤਰਦਾਤਾ-ਅਧਾਰਕ ਦੀ ਕੁੱਲ ਆਮਦਨ ਮਵੱਚ 1,70,94,000/- ਰੁਪਏ ਦੀ ਰਕਮ ਜੋੜ ਕੇ ਮੁੜ-ਮੁਲਾਂਕਣ ਆਦੇਸ਼ ਪਾਸ ਕੀਤਾ। ਉਸਨੇ ਮੰਮਨਆ ਮਕ, ਉਸਦੀ ਰਾਏ ਮਵੱਚ, ਇਹ ਬਚੇ ਹੋਏ , ਮੁਲਾਂਕਣ ਦਾ ਮਾਮਲਾ ਸੀ ਅਤੇ ਦ ਜਾਮਵਚਾਰ ਅਧੀਨ ਮੁਲਾਂਕਣ ਸਾਲ ਲਈ ਉੱਤਰਦਾਤਾ-1ਮੁਲਾਂਕਣ ਦੀ ਕੁੱਲ ਆਮਦਨ ਮਵੱਚ ਉਕਤ ਰਕਮ ਨ ੰ ਜੋੜਨ ਲਈ ਕਾਫੀ ਸਮੱਗਰੀ ਸੀ। 3. ਉੱਤਰਦਾਤਾ-ਮੁਲਾਂਕਣਕਰਤਾ ਨੇ ਦੁਖੀ ਮਮਹਸ ਸ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਕਾਰਪੋਰੇਟ ਆਮਦਨ ਟੈਕਸ (ਅਪੀਲ) ਅੱਗੇ ਅਪੀਲ ਦਾਇਰ ਕੀਤੀ। 21.02.2013 , ਦੇ ਆਦੇਸ਼ ਦੁਆਰਾਕਾਰਪੋਰੇਟ ਆਮਦਨ ਟੈਕਸ (ਅਪੀਲ) ਨੇ ਅਪੀਲ ਨ ੰ ਖਾਰਜ ਕਰ ਮਦੱਤਾ ਅਤੇਮੁਲਾਂਕਣ ਅਮਧਕਾਰੀ ਦੁਆਰਾ ਕੀਤੇ ਜੋੜ ਨ ੰ ਬਰਕਰਾਰ ਰੱਮਖਆ। ਉੱਤਰਦਾਤਾ-ਮੁਲਾਂਕਣਕਰਤਾ ਨੇ ਦੁਖੀ ਮਮਹਸ ਸ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਇਨਕਮ ਟੈਕਸ ਅਪੀਲੀ ਮਟਰਮਬਊਨਲਅੱਗੇ ਦ ਜੀ ਅਪੀਲ ਦਾਇਰ ਕੀਤੀ। 05.02.2014 , ਦੇ ਆਦੇਸ਼ ਦੁਆਰਾਮਟਰਮਬਊਨਲ ਨੇ ਅਪੀਲ ਦੀ ਇਜਾਜ਼ਤ ਮਦੱਤੀ ਅਤੇ ਸੀਆਈਟੀ (ਅਪੀਲ) ਦੇ ਆਦੇਸ਼ ਨ ੰ ਪਾਸੇ ਕਰ ਮਦੱਤਾ। 14. ਇਨਕਮ ਟੈਕਸ ਕਮਮਸ਼ਨਰ ਨੇ ਦੁਖੀ ਮਮਹਸ ਸ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 260-ਏ ਦੇ ਤਮਹਤ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਮਵੱਚ ਅਪੀਲ ਦਾਇਰ ਕੀਤੀ। ਅਯੋਗ ਹੁਕਮ ਦੇ ਕੇ, ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ ਅਪੀਲ ਨ ੰ ਖਾਰਜ ਕਰ ਮਦੱਤਾ ਅਤੇ ਮਟਰਮਬਊਨਲ ਦੇ ਹੁਕਮਾਂ ਦੀ ਪੁਸ਼ਟੀ ਕੀਤੀ ਮਜਸ ਨੇ ਇਸ ਅਦਾਲਤ ਮਵੱਚ ਆਮਦਨ ਕਰ ਕਮਮਸ਼ਨਰ ਦੁਆਰਾ ਅਪੀਲ ਕਰਨ ਲਈ ਮਵਸ਼ੇਸ਼ ਛੁੱਟੀ ਦਾਇਰ ਕਰਨ ਨ ੰ ਜਨਮ ਮਦੱਤਾ। 15. ਇਸ ਲਈ, ਛੋਟਾ ਸਵਾਲ, , ਜੋ ਇਸ ਅਪੀਲ ਮਵੱਚ ਮਵਚਾਰਨ ਲਈ ਉੱਠਦਾ ਹੈਇਹ ਹੈ ਮਕ ਕੀ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਇਨਕਮ ਟੈਕਸ ਕਮਮਸ਼ਨਰ (ਇੱਥੇ ਅਪੀਲਕਰਤਾ) ਦੁਆਰਾ ? ਦਾਇਰ ਕੀਤੀ ਗਈ ਅਪੀਲ ਨ ੰ ਖਾਰਜ ਕਰਨਾ ਜਾਇਜ਼ ਸੀ 16. ਸਰੀ ਐਚ.ਆਰ. ਰਾਓ, ਅਪੀਲਕਰਤਾ ਦੇ ਵਕੀਲ ਅਤੇ ਸਰੀ ਸਮਲਲ ਕਪ ਰ, ਪਰਤੀਵਾਦੀ ਦੇ ਵਕੀਲ ਨ ੰ ਸੁਮਣਆ। 17. ਮਧਰਾਂ ਦੇ ਮਵਦਵਾਨ ਵਕੀਲਾਂ ਨ ੰ ਸੁਣਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਅਤੇ ਕੇਸ ਦੇ ਮਰਕਾਰਡ ਅਤੇ , ਮਵਦਵਾਨ ਵਕੀਲ ਦੁਆਰਾ ਦਾਇਰ ਮਲਖਤੀ ਦਰਖਾਸਤਾਂ ਦੀ ਪੜਚੋਲ ਕਰਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦਅਸੀਂ ਇਸ ਅਪੀਲ ਨ ੰ ਮਨਜ਼ ਰੀ ਦੇਣ ਲਈ ਮਤਆਰ ਹਾਂ ਅਤੇ ਅਣਗਮਹਲੀ ਵਾਲੇ ਹੁਕਮਾਂ ਨ ੰ ਪਾਸੇ ਰੱਖਮਦਆਂ, 'ਕੇਸ ਨ ੰ ਉੱਚ ਅਦਾਲਤ ਕੋਲ ਭੇਜਦੇ ਹਾਂ। ਅਪੀਲ ਤੇ ਨਵੇਂ ਮਸਰੇ ਤੋਂ ਫੈਸਲਾ ਕਰਨ ਲਈ ਅਦਾਲਤ। 18. ਸਾਡੇ ਮਵਚਾਰ ਮਵੱਚ, , ਹੇਠਾਂ ਮਦੱਤੇ ਅਨੁਸਾਰਇੱਕ ਤੋਂ ਵੱਧ ਕਾਰਨਾਂ ਕਰਕੇ ਕੇਸ ਨ ੰ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਮਵੱਚ ਭੇਜਣ ਦੀ ਲੋੜ ਪਈ ਹੈ। 19. ਪਮਹਲਾਂ, ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ ਕਾਨ ੰਨ ਦਾ ਕੋਈ ਵੀ ਮਹੱਤਵਪ ਰਨ ਸਵਾਲ ਮਤਆਰ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਮਜਵੇਂ ਮਕ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 260-ਏ ਦੇ ਤਮਹਤ ਬਣਾਏ ਜਾਣ ਦੀ ਲੋੜ ਸੀ। 20. ਦ ਸਰਾ, ਅਯੋਗ ਹੁਕਮ ਦੇ ਪੈਰਾ 2 ਮਵੱਚ, ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ ਦੇਮਖਆ ਮਕ "ਮਾਲ "।ਸਾਡੇ ਮਵਚਾਰ ਲਈ ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਹੇਠਾਂ ਮਦੱਤੇ ਸਵਾਲਾਂ ਨ ੰ ਬੇਨਤੀ ਕਰਦਾ ਹੈ 21. 2 , ਪੈਰਾ 2 ਮਵੱਚ ਮਦੱਤੇ ਗਏ ਦੋ ਸਵਾਲ ਮਜਵੇਂ ਮਕ ਪੈਰਾ ਨ ੰ ਪੜਹਨ ਤੋਂ ਸਪੱਸ਼ਟ ਹੈਹਾਈ ਕੋਰਟ ਦੁਆਰਾ ਬਣਾਏ ਗਏ ਸਵਾਲ ਨਹੀਂ ਸਨ ਮਜਵੇਂ ਮਕ ਅਪੀਲ ਦੀ ਸੁਣਵਾਈ ਲਈ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 260-ਏ(3) ਦੇ ਤਮਹਤ ਫਰੇਮ ਕੀਤੇ ਜਾਣ ਦੀ ਲੋੜ ਸੀ ਪਰ ਅਪੀਲਕਰਤਾ ਵੱਲੋਂ ਪੁੱਛੇ ਗਏ ਸਵਾਲ ਸਨ। 22. ਸਾਡੇ ਮਵਚਾਰ ਮਵੱਚ, ਅਪੀਲ ਦਾਖਲ ਕਰਨ ਲਈ ਅਪੀਲਕਰਤਾ ਦੁਆਰਾ ਪਰਸਤਾਮਵਤ ਸਵਾਲਾਂ ਅਤੇ ਅਦਾਲਤ ਦੁਆਰਾ ਬਣਾਏ ਗਏ ਸਵਾਲਾਂ ਮਵੱਚ ਇੱਕ ਅੰਤਰ ਹੈ। 23. ਅਪੀਲਕਰਤਾ ਦੁਆਰਾ ਪਰਸਤਾਮਵਤ ਸਵਾਲ, ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 260-ਏ (2) (ਸੀ) ਦੇ ਅਧੀਨ ਆਉਂਦੇ ਹਨ ਜਦੋਂ ਮਕ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਦੁਆਰਾ ਬਣਾਏ ਗਏ ਸਵਾਲ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 260-ਏ (3) 260-ਏ (4) ਦੇ ਅਧੀਨ ਦੇ ਅਧੀਨ ਆਉਂਦੇ ਹਨ। ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ ਪਰਦਾਨ ਕੀਤੇ ਗਏ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 260-ਏ ਦੀ ਉਪ ਧਾਰਾ (3) ਅਧੀਨ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ''ਦੁਆਰਾ ਬਣਾਏ ਗਏ ਸਵਾਲਾਂ ਤੇ ਹੀ ਅਪੀਲ ਦੀ ਸੁਣਵਾਈ ਗੁਣਾਂ ਦੇ ਆਧਾਰ ਤੇ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ , 'ਤੇ ਹੀ ਹੈ। ਦ ਜੇ ਸ਼ਬਦਾਂ ਮਵਚਅਪੀਲ ਦੀ ਸੁਣਵਾਈ ਅਦਾਲਤ ਦੁਆਰਾ ਬਣਾਏ ਗਏ ਸਵਾਲਾਂ ਕੀਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। 24. ਤੀਸਰਾ, ਜੇਕਰ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਦਾ ਮਵਚਾਰ ਸੀ ਮਕ ਅਪੀਲ ਮਵੱਚ ਕਾਨ ੰਨ ਦਾ ਕੋਈ , ਠੋਸ ਸਵਾਲ ਸ਼ਾਮਲ ਨਹੀਂ ਸੀਤਾਂ ਉਸ ਨ ੰ ਇਸ ਪਰਭਾਵ ਲਈ ਇੱਕ ਸਪੱਸ਼ਟ ਖੋਜ ਦਰਜ ਕਰਨੀ ਚਾਹੀਦੀ ਸੀ ਮਕ ਅਪੀਲਕਰਤਾ ਦੁਆਰਾ ਪਰਸਤਾਮਵਤ ਸਵਾਲ ਜਾਂ ਤਾਂ ਕੇਸ ਮਵੱਚ ਨਹੀਂ ਉੱਠਦੇ ਜਾਂ /ਅਤੇ ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਮਹੱਤਵਪ ਰਨ ਸਵਾਲ ਨਹੀਂ ਹਨ ਤਾਂ ਜੋ ਇਸ ਦੇ ਦਾਖਲੇ ਲਈ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 260-ਏ ਦੀ ਕਠੋਰਤਾ ਨ ੰ ਆਕਰਮਸ਼ਤ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕੇ ਅਤੇ ਇਸਦੇ ਅਨੁਸਾਰ ਅਪੀਲ ਨ ੰ ਸੀਮਾ ਮਵੱਚ ਖਾਰਜ ਕਰ ਮਦੱਤਾ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। Case: PR. COMMISSIONER OF INCOME TAX CENTRAL 2 versus M/S A.A. ESTATE PVT. LTD. [[2019] 6 S.C.R. 188] (2019) 23. The questions, which are proposed by the appellant, fall underSection 260-A (2) (c) of the Act whereas the questions framed by theHigh Court fall under Section 260-A (3) of the Act. The appeal is heardon merits only on the questions framed by the High Court under sub-section (3) of Section 260-A of the Act as provided under Section 260-A (4) of the Act. In other words, the appeal is heard only on the questionsframed by the Court. 24. Third, if the High Court was of the view that the appeal didnot involve any substantial question of law, it should have recorded acategorical finding to that effect saying that the questions proposed bythe appellant either do not arise in the case or/and are not substantialquestions of law so as to attract the rigor of Section 260-A of the Act forits admission and accordingly should have dismissed the appeal in limine. 25. It was, however, not done and instead the High Court withoutadmitting the appeal and framing any question of law issued notice ofappeal to the respondent-assessee, heard both the parties on the questionsurged by the appellant and dismissed it. In our view, the respondent hada right to argue “at the time of hearing” of the appeal that the questionsframed were not involved in the appeal and this the respondent could A B C D E F G H Aurge by taking recourse to sub- section (5) of Section 260-A of the Act.But this stage in this case did not arise because as mentioned above, theHigh Court neither admitted the appeal nor framed any question asrequired under sub-section (3) of Section 260-A of the Act. The expression“such question” referred to in sub- section (5) of Section 260-A of theAct means the questions which are framed by the High Court underBsub-section (3) of Section 260-A at the time of admission of the appealand not the one proposed in Section 260-A (2) (c) of the Act by theappellant. 26. We are, therefore, of the view that the High Court did notdecide the appeal in conformity with the mandatory procedure prescribedCin Section 260-A of the Act.27. Fourth, the High Court should have seen that followingsubstantial questions of law do arise in the appeal for being answered ontheir respective merits: D(i) Whether the reasons contained in Notice under Section148 are relevant and sufficient for issuance of the saidNotice dated 22.09.2010 ? (ii) Whether any case of escaped assessment within themeaning of Section 147 read with Section 148 of the Act forEthe assessment year in question is made out by theCommissioner of Income Tax on the basis of the reasonsset out in the notice ? (iii) Whether a case of presumption as contemplated underSection 132(4A) of the Act could be drawn against therespondent-assessee on the basis of a document (AnnexureFAB-1) which was seized in search operation carried in thebusiness premises of another assessee - M/s Ashokbuildcom by adding a sum of Rs.1,70,94,000/- fordetermining the total tax liability of the respondent for theyear in question as an escaped assessment so as to enableGthe Department to issue notice dated 22.09.2010 underSection 148 of the Act to the respondent? 28. In the light of the foregoing discussion, we consider it just andproper to remand the case to the High Court for deciding the appealafresh to answer the questions framed above on merits in accordanceHwith law. PR. COMMISSIONER OF INCOME TAX CENTRAL 2 v.M/S A.A. ESTATE PVT. LTD. [ABHAY MANOHAR SAPRE, J.] 29. The appeal thus succeeds and is accordingly allowed. Theimpugned order is set aside. The case is remanded to the High Courtfor deciding the appeal filed by the Commissioner of Income Tax-Mumbaiafresh on merits as provided under Section 260-A(4) of the Act to answerthe three questions framed by this Court under Section 260-A(3) of theAct. 30. The High Court will decide the appeal uninfluenced by anyobservations made in the impugned order and in this order because havingformed an opinion to remand the case, we have not expressed any opinionon the merits of the case. Nidhi Jain Matter remanded to High Court. A B C D E F G Case: PR. COMMISSIONER OF INCOME TAX CENTRAL 2 versus M/S A.A. ESTATE PVT. LTD. [[2019] 6 S.C.R. 188] (2019) 22. , हमारे विचार में यहाॅ पर प्रश्नजो अपील के अंगीकरण हेतु अपीलार्थी द्वारा प्रस्तावित किये गये और जोप्रश्न न्यायालय द्वारा विरचित किये गये उनमें अन्तर है। 23. , , 260-A(2)(c) प्रश्नजो अपीलार्थी द्वारा प्रस्तावित किये गये थेवह अधिनियम की धारा के अन्तर्गत आते260-A(3) हैं जबकि उच्च न्यायालय द्वारा विरचित किये गये प्रश्न अधिनियम की धारा के अन्तर्गत आते हैं। उच्च, न्यायालय द्वारा गुणदोष के आधार पर उन प्रश्नों पर सुनवायी की गयीजो उनके द्वारा अधिनियम की धारा 260-A की उपधारा (3) 260-A उपधारा (4)के अन्तर्गत विरचित किये गये थे जैसा कि अधिनियम की धारा उपबंधित करती है। अन्य शब्दों में अपील की सुनवायी केवल उन्हीं प्रश्नों पर की जाती है जो न्यायालय द्वाराविरचित किये हों। 24. तीसरे, अगर उच्च न्यायालय इस दृष्टिकोण का था कि अपील में वादी का कोई सारवान प्रश्न सम्मिलितनहीं है तो उसे उस संबंध में सुस्पष्ट अपना निष्कर्ष देते हुए यह कहना चाहिए था कि जो अपीलार्थी द्वारा/, प्रस्तावित प्रश्न हैं या तो मामले में उत्पन्न नहीं होते हैं याऔर विधि के सारवान प्रश्न नहीं हैंजो अधिनियम कीधारा 260-A के प्रावधानों के कठोरता को उसके दाखिले हेतु आकर्षित करते हैं और तद्नुसार अपील कोदहलीज पर ही निरस्त कर देना चाहिए था। 25. परन्तु ऐसा न करके बल्कि इसके स्थान पर उच्च न्यायालय द्वारा बिना अपील को अंगीकृत किये और-, विधि का प्रश्न विरचित किये अपील की नोटिस प्रत्यर्थीनिर्धारिती को जारी कर दी गयीऔर दोनों पक्षकारोंको उन प्रश्नों पर सुना गया जो अपीलार्थी द्वारा बताये गये थे और अपील निरस्त कर दी गयी। हमारे विचार मेंप्रत्यर्थी के पास एक अधिकार अपील की सुनवायी के समय यह कहने का था कि विरचित किये गये प्रश्न260-A के उपधारा (5) अपील में सम्मिलित नहीं थे और जिन्हें प्रत्यर्थी अधिनियम की धारा के अन्तर्गत उठासकता था, , परन्तु यह स्तर इस मामले में उत्पन्न नहीं हुआ क्योंकि जैसा उपरोक्त कहा गया हैउच्च न्यायालय260-A की उपधारा (3) द्वारा न तो अपील को अंगीकृत किया गया और न ही जैसा कि अधिनियम की धारा में260-A की उपधाराआवश्यक प्रश्न ही विरचित किये गये। अभिव्यक्ति ’’वह प्रश्न’’ जिन्हें अधिनियम की धारा (5) में सन्दर्भित करता है अर्थात् प्रश्न जो उच्च न्यायालय द्वारा अपील के अंगीकरण के समय अन्तर्गत धारा260-A की उपधारा (3) 260-में विरचित किया जाता है न कि वह प्रश्न जिन्हें अपीलार्थी अधिनियम की धारा A(2)(c) के अन्तर्गत प्रस्तावित करे। 26. अतः हम, 260-A इस विचार के हैं कि उच्च न्यायालय द्वारा अपील अधिनियम की धारा में विहितआज्ञापक प्रक्रिया के अनुरूप निर्णीत नहीं किया गया। 27. , चतुर्थउच्च न्यायालय को निम्नलिखित विधि के सारवान प्रश्नों को देखना चाहिए था जो अपील में उनकेगुणदोष के आधार पर निष्कर्ष देने के लिए उत्पन्न हुए थे। (i) 148 22-09-क्या अन्तर्गत धारा में दिये गये आधार सुसंगत व पर्याप्त थे और कथित नोटिस दिनांकित 2010 ?को जारी करने के लिए पर्याप्त थे (ii)147 148 , क्या अधिनियम की धारा सपठित धारा के अन्तर्गतप्रश्नगत निर्धारण वर्ष में छूटे हुए निर्धारण का?मामला आयुक्त आयकर विभाग द्वारा नोटिस में दिये गये कारणों के आधार पर बनता था (iii) , 132(4A) , क्या उपधारणा का मामलाजैसा कि अधिनियम की धारा में अनुध्यात हैप्रत्यर्थी द्वारा(0 बी0-1) के आधार पर, 0 अशोकनिर्धारिती के विरूद्ध एक अभिलेख एनेक्जर एजो दूसरे निर्धारिती मे, के आधार परविल्डकाॅम के व्यावसायिक परिसरों में किये गये तलाशी अभियान के फलस्वरूप प्राप्त हुई थीबनता है, 1,70,94,000/- 0 जिसके द्वारा रूप्रत्यर्थी के विरूद्ध प्रश्नगत वर्ष में छूटे हुए निर्धारण के रूप में, 22-09-2010प्रत्यर्थी के सकल निर्धारित किया जा सकता थाजिसके आधार पर विभाग नोटिस दिनांकित 148 ?को अधिनियम की धारा के अन्तर्गत प्रत्यर्थी को जारी कर सकता था 28. , उपरोक्त विवेचन के प्रकाश मेंहमारे विचार में यह न्यायसंगत व उचित होगा कि उच्च न्यायालय को अपीलको नये सिरे से निर्णीत किये जाने हेतु मामला प्रतिप्रेषित किया जाये जिसमें उपरोक्त विरचित प्रश्नों कोविधिनुसार उत्तरित किया जा सके। 29. अतः अपील सफल होती है तद्नुसार स्वीकार की जाती है। आक्षेपित आदेश अपास्त किया जाता है।, मामला उच्च न्यायालय कोआयुक्त आयकर मुम्बई द्वारा दाखिल अपील को गुणदोष के आधार पर नये सिरे से, , 260-A(4) , केनिर्णीत करने हेतुप्रतिप्रेषित किया जाता हैजैसा कि अधिनियम की धारा में उपबंधित है260-A(3) अनुसार तीन प्रश्न जो इस न्यायालय द्वारा अधिनियम के अन्तर्गत धारा में विरचित किये गये हों कोगुणदोष के आधार पर निर्णीत करें। Case: PR. COMMISSIONER OF INCOME TAX CENTRAL 2 versus M/S A.A. ESTATE PVT. LTD. [[2019] 6 S.C.R. 188] (2019) 24. ਤੀਸਰਾ, ਜੇਕਰ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਦਾ ਮਵਚਾਰ ਸੀ ਮਕ ਅਪੀਲ ਮਵੱਚ ਕਾਨ ੰਨ ਦਾ ਕੋਈ , ਠੋਸ ਸਵਾਲ ਸ਼ਾਮਲ ਨਹੀਂ ਸੀਤਾਂ ਉਸ ਨ ੰ ਇਸ ਪਰਭਾਵ ਲਈ ਇੱਕ ਸਪੱਸ਼ਟ ਖੋਜ ਦਰਜ ਕਰਨੀ ਚਾਹੀਦੀ ਸੀ ਮਕ ਅਪੀਲਕਰਤਾ ਦੁਆਰਾ ਪਰਸਤਾਮਵਤ ਸਵਾਲ ਜਾਂ ਤਾਂ ਕੇਸ ਮਵੱਚ ਨਹੀਂ ਉੱਠਦੇ ਜਾਂ /ਅਤੇ ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਮਹੱਤਵਪ ਰਨ ਸਵਾਲ ਨਹੀਂ ਹਨ ਤਾਂ ਜੋ ਇਸ ਦੇ ਦਾਖਲੇ ਲਈ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 260-ਏ ਦੀ ਕਠੋਰਤਾ ਨ ੰ ਆਕਰਮਸ਼ਤ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕੇ ਅਤੇ ਇਸਦੇ ਅਨੁਸਾਰ ਅਪੀਲ ਨ ੰ ਸੀਮਾ ਮਵੱਚ ਖਾਰਜ ਕਰ ਮਦੱਤਾ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। 25. , ਹਾਲਾਂਮਕਅਮਜਹਾ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਮਗਆ ਸੀ ਅਤੇ ਇਸ ਦੀ ਬਜਾਏ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ ਅਪੀਲ ਨ ੰ ਸਵੀਕਾਰ ਕੀਤੇ ਮਬਨਾਂ ਅਤੇ ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਮਕਸੇ ਵੀ ਪਰਸ਼ਨ ਨ ੰ ਮਤਆਰ ਕੀਤੇ ਮਬਨਾਂ ਜਵਾਬਦੇਹ-ਮੁਲਾਂਕਣਕਰਤਾ ਨ ੰ ਅਪੀਲ ਦਾ ਨੋਮਟਸ ਜਾਰੀ ਕੀਤਾ, ਅਪੀਲਕਰਤਾ ਦੁਆਰਾ 'ਬੇਨਤੀ ਕੀਤੇ ਸਵਾਲਾਂ ਤੇ ਦੋਵਾਂ ਮਧਰਾਂ ਨ ੰ ਸੁਮਣਆ ਅਤੇ ਇਸਨ ੰ ਖਾਰਜ ਕਰ ਮਦੱਤਾ। ਸਾਡੇ ਮਵਚਾਰ ਮਵੱਚ, ਜਵਾਬਦਾਤਾ ਨ ੰ ਅਪੀਲ ਦੀ "ਸੁਣਵਾਈ ਦੇ ਸਮੇਂ" ਬਮਹਸ ਕਰਨ ਦਾ ਅਮਧਕਾਰ ਸੀ ਮਕ ਫਰੇਮ ਕੀਤੇ ਗਏ ਸਵਾਲ ਅਪੀਲ ਮਵੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਨਹੀਂ ਸਨ ਅਤੇ ਇਹ ਜਵਾਬਦਾਤਾ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 260-ਏ ਦੀ ਉਪ ਧਾਰਾ (5) ਦਾ ਸਹਾਰਾ ਲੈ ਕੇ ਬੇਨਤੀ ਕਰੋ। ਪਰ ਇਸ ਕੇਸ ਮਵੱਚ ਇਹ ਪੜਾਅ ਇਸ ਲਈ ਪੈਦਾ ਨਹੀਂ ਹੋਇਆ ਮਕਉਂਮਕ ਮਜਵੇਂ ਮਕ , ਉੱਪਰ ਦੱਮਸਆ ਮਗਆ ਹੈਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ ਨਾ ਤਾਂ ਅਪੀਲ ਨ ੰ ਸਵੀਕਾਰ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 260-ਏ ਦੀ ਉਪ ਧਾਰਾ (3) ਅਧੀਨ ਲੋੜ ਅਨੁਸਾਰ ਕੋਈ ਸਵਾਲ ਮਤਆਰ ਕੀਤਾ। ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 260-ਏ ਦੀ ਉਪ-ਧਾਰਾ (5) ਮਵੱਚ ਦਰਸਾਏ ਗਏ "ਅਮਜਹੇ ਸਵਾਲ" 260-ਏ ਦੀ ਉਪ-ਧਾਰਾ (3) ਅਧੀਨ ਦਾ ਅਰਥ ਹੈ ਉਹ ਸਵਾਲ ਜੋ ਦਾਖਲੇ ਦੇ ਸਮੇਂ ਧਾਰਾ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਦੁਆਰਾ ਬਣਾਏ ਗਏ ਹਨ। ਅਪੀਲ ਦੀ ਅਤੇ ਅਪੀਲਕਰਤਾ ਦੁਆਰਾ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 260-ਏ (2) (ਸੀ) ਮਵੱਚ ਪਰਸਤਾਮਵਤ ਨਹੀਂ। 26. ਇਸਲਈ, ਸਾਡਾ ਮਵਚਾਰ ਹੈ ਮਕ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 260-ਏ ਮਵੱਚ ਮਨਰਧਾਰਤ ਲਾਜ਼ਮੀ ਪਰਮਕਮਰਆ ਦੇ ਅਨੁਰ ਪ ਅਪੀਲ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ। 27. ਚੌਥਾ, ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨ ੰ ਇਹ ਦੇਖਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਸੀ ਮਕ ਉਹਨਾਂ ਦੀਆਂ ਯੋਗਤਾਵਾਂ 'ਤੇ ਜਵਾਬ ਮਦੱਤੇ ਜਾਣ ਲਈ ਅਪੀਲ ਮਵੱਚ ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਹੇਠ ਮਲਖੇ ਮਹੱਤਵਪ ਰਨ ਸਵਾਲ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦੇ ਹਨ: (i) ਕੀ ਧਾਰਾ 148 ਦੇ ਅਧੀਨ ਨੋਮਟਸ ਮਵੱਚ ਸ਼ਾਮਲ ਕਾਰਨ 22.09.2010 ਨ ੰ ?ਉਕਤ ਨੋਮਟਸ ਜਾਰੀ ਕਰਨ ਲਈ ਢੁਕਵੇਂ ਅਤੇ ਕਾਫੀ ਹਨ (ii) ਕੀ ਮੁਲਾਂਕਣ ਸਾਲ ਲਈ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 148 ਦੇ ਨਾਲ ਪੜਹੀ ਗਈ ਧਾਰਾ 147 ਦੇ ਅਰਥਾਂ ਦੇ ਅੰਦਰ ਬਚੇ ਹੋਏ ਮੁਲਾਂਕਣ ਦਾ ਕੋਈ ਮਾਮਲਾ ਇਨਕਮ ਟੈਕਸ ਕਮਮਸ਼ਨਰ ਦੁਆਰਾ ਨੋਮਟਸ ਮਵੱਚ ਦੱਸੇ ਗਏ ਕਾਰਨਾਂ ਦੇ ਆਧਾਰ 'ਤੇ ਬਣਾਇਆ ਮਗਆ ਹੈ? (iii) ਕੀ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 132(4A) ਦੇ ਤਮਹਤ ਮਵਚਾਰੇ ਗਏ ਅਨੁਮਾਨ ਦਾ ਮਾਮਲਾ AB-1) ਦੇ ਆਧਾਰ 'ਇੱਕ ਦਸਤਾਵੇਜ਼ (ਅਨੇਕਚਰ ਤੇ ਉੱਤਰਦਾਤਾ-ਮੁਲਾਂਕਣਕਰਤਾ ਦੇ ਮਵਰੁੱਧ ਮਲਆ ਜਾ ਸਕਦਾ ਹੈ ਜੋ ਕਾਰੋਬਾਰੀ ਅਹਾਤੇ ਮਵੱਚ ਕੀਤੀ ਗਈ ਤਲਾਸ਼ੀ ਮੁਮਹੰਮ ਦੌਰਾਨ ਜ਼ਬਤ 1,70,94,000/- ਕੀਤਾ ਮਗਆ ਸੀ। ਇੱਕ ਹੋਰ ਮੁਲਾਂਕਣ ਦੇ - ਮੈਸਰਜ਼ ਅਸ਼ੋਕ ਮਬਲਡਕੌਮ ਨੇ ਰੁਪਏ ਦੀ ਰਕਮ ਜੋੜ ਕੇ ਉੱਤਰਦਾਤਾ ਦੀ ਕੁੱਲ ਟੈਕਸ ਦੇਣਦਾਰੀ ਨ ੰ ਇੱਕ ਬਚੇ ਹੋਏ ਮੁਲਾਂਕਣ ਵਜੋਂ ਮਨਰਧਾਰਤ ਕੀਤਾ ਤਾਂ ਜੋ ਮਵਭਾਗ ਨ ੰ ਨੋਮਟਸ ਜਾਰੀ ਕਰਨ ਦੇ ਯੋਗ ਬਣਾਇਆ ਜਾ ਸਕੇ। ਮਮਤੀ 22.09.2010 ਨ ੰ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 148 ਅਧੀਨ ਉੱਤਰਦਾਤਾ ਨ ੰ? 28. , ਉਪਰੋਕਤ ਮਵਚਾਰ-ਵਟਾਂਦਰੇ ਦੀ ਰੋਸ਼ਨੀ ਮਵੱਚਅਸੀਂ ਕਾਨ ੰਨ ਅਨੁਸਾਰ ''ਯੋਗਤਾਵਾਂ ਦੇ ਆਧਾਰ ਤੇ ਉਪਰੋਕਤ ਸਵਾਲਾਂ ਦੇ ਜਵਾਬ ਦੇਣ ਲਈ ਅਪੀਲ ਤੇ ਨਵੇਂ ਮਸਰੇ ਤੋਂ ਫੈਸਲਾ ਲੈਣ ਲਈ ਕੇਸ ਨ ੰ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਕੋਲ ਭੇਜਣਾ ਜਾਇਜ਼ ਅਤੇ ਉਮਚਤ ਸਮਝਦੇ ਹਾਂ। 29. ਇਸ ਤਰਹਾਂ ਅਪੀਲ ਸਫਲ ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਉਸ ਅਨੁਸਾਰ ਇਜਾਜ਼ਤ ਮਦੱਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਅਪਰਵਾਮਨਤ ਆਰਡਰ ਨ ੰ ਪਾਸੇ ਰੱਮਖਆ ਮਗਆ ਹੈ। ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 260-ਏ(4) ਅਧੀਨ 'ਪਰਦਾਨ ਕੀਤੇ ਗਏ ਗੁਣਾਂ ਦੇ ਆਧਾਰ ਤੇ ਇਨਕਮ ਟੈਕਸ-ਮੁੰਬਈ ਦੇ ਕਮਮਸ਼ਨਰ ਦੁਆਰਾ ਦਾਇਰ ਕੀਤੀ ਗਈ ਅਪੀਲ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਕਰਨ ਲਈ ਇਸ ਅਦਾਲਤ ਦੁਆਰਾ ਧਾਰਾ 260- ਦੇ ਤਮਹਤ ਬਣਾਏ ਗਏ ਮਤੰਨ ਸਵਾਲਾਂ ਦੇ ਜਵਾਬ ਦੇਣ ਲਈ ਕੇਸ ਨ ੰ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਕੋਲ ਭੇਜ ਮਦੱਤਾ ਮਗਆ ਹੈ। ਐਕਟ ਦਾ ਏ(3)। 30. ਹਾਈਕੋਰਟ ਅਪਰਵਾਮਨਤ ਹੁਕਮਾਂ ਮਵੱਚ ਕੀਤੀਆਂ ਗਈਆਂ ਮਕਸੇ ਵੀ ਮਟੱਪਣੀਆਂ ਤੋਂ ਪਰਭਾਮਵਤ ਰਮਹ ਕੇ ਅਪੀਲ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਕਰੇਗੀ ਅਤੇ ਇਸ ਆਦੇਸ਼ ਮਵੱਚ ਮਕਉਂਮਕ ਕੇਸ ਨ ੰ , ਮਰਮਾਂਡ ਕਰਨ ਲਈ ਇੱਕ ਰਾਏ ਬਣਾਈ ਗਈ ਹੈਅਸੀਂ ਕੇਸ ਦੇ ਗੁਣਾਂ ਬਾਰੇ ਕੋਈ ਰਾਏ ਨਹੀਂ ਜ਼ਾਹਰ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਮਨਧੀ ਜੈਨ ਮਾਮਲਾ ਹਾਈਕੋਰਟ ਨ ੰ ਭੇਜ ਮਦੱਤਾ ਮਗਆ ਹੈ। ਡਿਸਕਲੇਮਰ ਸਥਾਨਕ ਭਾਸਾ ਡ ਿੱਚ ਅਨੁ ਾਦ ਕੀਤਾ ਡਿਆ ਡਨਆ ਡਨਰਣਾਂ ਕੇ ਲ ਮੁਕਿੱਦਮੇਬਾਜਾਂ ਲਈ ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਆਪਣੀ ਭਾਸਾ ਡ ਿੱਚ ਸਮਝਣ ਤਿੱਕ ਹੀ ਸੀਮਤ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸਦਾ ਡਕਸੇ ਹੋਰ ਉਦੇਸ ਲਈ ਇਸਤੇਮਾਲ ਨਹੀਾਂ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ । ਸਾਰੇ ਡ ਹਾਰਕ ਅਤੇ ਅਡਿਕਾਰਤ ਮੰਤ ਾਂ ਲਈ ਡਨਆਾਂ ਡਨਰਣੇ ਦਾ ਅੰਿਰੇਜੀ ਸੰਸਕਰਣ ਪਰਮਾਡਣਕ ਹੋ ੇਿਾ ਅਤੇ ਅਮਲ ਲਾਿੂ ਕਰਨ ਲਈ ਇਸ ਨੂੰ ਤਰਜੀਹ ਡਦਿੱਤੀ ਜਾ ੇਿੀ। Tarun Mehra Advocate Case: PR. COMMISSIONER OF INCOME TAX CENTRAL 2 versus M/S A.A. ESTATE PVT. LTD. [[2019] 6 S.C.R. 188] (2019) 29. अतः अपील सफल होती है तद्नुसार स्वीकार की जाती है। आक्षेपित आदेश अपास्त किया जाता है।, मामला उच्च न्यायालय कोआयुक्त आयकर मुम्बई द्वारा दाखिल अपील को गुणदोष के आधार पर नये सिरे से, , 260-A(4) , केनिर्णीत करने हेतुप्रतिप्रेषित किया जाता हैजैसा कि अधिनियम की धारा में उपबंधित है260-A(3) अनुसार तीन प्रश्न जो इस न्यायालय द्वारा अधिनियम के अन्तर्गत धारा में विरचित किये गये हों कोगुणदोष के आधार पर निर्णीत करें। 30. उच्च न्यायालय विवादित आदेश में दिये गये निष्कर्षों से प्रभावित हुए बिना अपील निर्णीत करेगा और इसआदेश में चूॅकि पत्रावली प्रतिप्रेषित करने का विचार बनाया गया है हम कोई भी विचार मामले के गुणदोष परअभिव्यक्त नहीं करेंगे। मामला उच्च न्यायालय को प्रतिप्रेषित किया जाता है। Page No 5 Translated/Vetted by:- Arvind Rai, Addl. District Judge, Court No. 01, SPN (ID No.U.P.-5974)
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