Case LawSupreme Court › [2019] 5 S.C.R. 6

The Principal Commissioner Of Income Tax-8 v. M/S Yes Bank Ltd

Supreme Court [2019] 5 S.C.R. 6 15 Mar 2019 In favour of: Revenue
Forum / Bench
Supreme Court
Parties
The Principal Commissioner Of Income Tax-8 v. M/S Yes Bank Ltd
Date of order
15 Mar 2019
Assessment year(s)
2007-2008
Outcome
Allowed

Case summary

In The Principal Commissioner Of Income Tax-8 v. M/S Yes Bank Ltd, the Supreme Court (2019) allowed the appeal under Section 35, Section 263 of the Income-tax Act. The decision went in favour of the Revenue.

Decision: It was, however, not decided.[Paras 12, 13] [9-C-E] 1.2 The High Court should have framed the substantialquestion of law on the applicability of Section 35-D of the 1961Act in addition to other questions and then should have answeredthem in accordance with law rather than to leave the question(s)undecided. [Para 14] [9...

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Sections referenced in this judgment

The order — as passed by the Supreme Court

Case: THE PRINCIPAL COMMISSIONER OF INCOME TAX-8 versus M/S YES BANK LTD. [[2019] 5 S.C.R. 6] (2019) [इंग्रजीत टंकलि�खि�त न्यायनि�र्ण�याचा मराठीत अ�ुवाद.] [२०१९] ५ एस.सी.आर. ६ प्रधा� आयकर आयुक्त-८ निवरुद्ध मे. येस बँक लि�. (निदवार्णी अपी� क्रमांक ३१४८/२०१९) माच� १५, २०१९ . अभय म�ोहर सपे आलर. नद�ेश माहेशरी][न्या्ण न्या , १९६१ - कलम ३५-डी, २६०-वादी-बँक प्राप्ति�कर कायदाए आणि� २६३ – उत्तर(करदाते) हे एक औद्योगि#क उपक्रम आहे की नाही हा मुद्दा होता जे�ेकरून त्यांना १९६१ च्या -साठी- कर कायद्याच्या कलम ३५डी अन्वये वजावटी दावा करण्याचा अणि6कार णिमळेल गिन6ा8र� अणि6काऱ्याने आदेश गिदल्यानंतर आयुक्तांनी प्रगितकूल आदेश पारिरत केले- प्राप्ति�कर अपीलीय न्यायाणि6कर�ाने (आयटीएटी) उत्तरवादीने दाखल केलेले अपील मंजूर केले – -अपी�कर्त्या�े – महसू�ा�े १९६१ च्या कायद्याच्या क�म २६०ए अन्वये उच्च न्याया�यासमोर अपी� दा�� के�े- ते फेटाळण्यात आ�े – अपी�मध्ये असा नि�र्ण�य निद�ा की – उच्च -न्याया�या�े १९६१ च्या कायद्याच्या क�म २६०ए अन्वये कोर्णताही सारभूत कायदेशीर प्रश्न तयार के�ा �ाही - उच्च न्यायालयाने या प्रकर�ात उद्भवलेल्या को�त्याही मुद्द्यावर गिन�8य न घेता अपील फेटाळले – या अपी�ाती� मुख्य मुद्दा हा उच्च न्याया�या�े योग्यरिरर्त्य �ोंद -, घेतल्याप्रमार्णे १९६१ च्या कायद्याती� क�म ३५डी ही उत्तरवादीस �ागू होते असा होतापरंतु र्त्यवर नि�र्ण�य झा�ा �ाही – आक्षेनिपत आदेश रद्दबात� करण्यात आ�ा – १९६१ चा -कायद्याचे क�म ३५डी उत्तरवादीस �ागू होण्याबाबतचा मुद्दा उत्तरवादीच्या सांगण्यावरू� �ुसार, हे अपी� दुसरे उच्च न्याया�यासमोर दुसऱ्या अपी�मध्ये निवचाराधी� आहे – र्त्य, अपी� प्र�ंनिबत असल्यासर्त्य अपी�सह कायद्या�ुसार गुर्णवत्तेवर नि�र्ण�य घेण्यासाठी उच्च न्याया�यात पाठवत आहोत – आम्ही या �टल्याती� गुर्णवत्तेबद्द� कोर्णतेही मत प्रदलिश�त करीत �ाही. अपी� मंजूर करत या न्याया�या�े – .१ उच नाया�या�े या अनप�ाअसा नि�र्ण�य निद�ा की – १त दोन्ही पक्षकारांचे म्हर्णर्णे -ऐकू�ही पाख^कर कायदा, १९६१ चा क�म २६०अ अनये आवशक अस�ेला कायदाचा कोरताही सारभूत पश तयार के�ा �ाही., दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे तरउच्च न्याया�या�े अपी�मध्ये कायद्याचा कोर्णताही महत्त्वाचा प्रश्न �सल्याच्या आधारावर अपी� फेटाळू� �ाव�े �ाही. उच्च न्याया�या�े प्रकरर्णामध्ये उद्भव�ेल्या कोर्णर्त्यही मुद्द्यावर नि�र्ण�य � देता अपी� फेटाळू� �ाव�े आलिर्ण असा नि�र्ण�य निद�ा की ते आवश्यक �व्हते. उच नाया�या�े -पररचेद ६ मधे योग �ोंद घेतलापमारे या अनप�ात मुख मुदावादीरिरर्त्य उत्तर-करदार�ा (बँक) १९६१ चा कायदाचे क�म ३५ड �ागू करणासंदभा�त होता. मात्र, --रवर न�र�य झा�ा �ाही. [, १३] [९सीई]परिरच्छेद १२ -१.२ उच नाया�या�े इतर पशांबरोबरच १९६१ चा कायदाती� क�म ३५ड चा अंम�बजावरीबाबत कायदाचा सारभूत पश तयार कराय�ा हवा होता आलर आलिर्ण �ंतर . [पररचेद १४] [९-प्रश्न अनि�लिर्ण�त ठेवण्यापेक्षा कायद्या�ुसार र्त्यंची उत्तरे द्याय�ा हवी होती-ईएफ] १.३के�ा जातो. आक्षेनिपत आदेश रद्दबात� न्याया�याच्या असे नि�दशास आर्णू� देण्यात आ�े आहे की एका अपी�ात उत्तरवादीच्या सांगण्यावरू�, उत्तरवादी-बँके�ा . कायद्याचे क�म ३५-डी �ागू करण्यासंदभा�ती� मुद्दा हा उच्च न्याया�यात निवचाराधी� आहेर�ुसार या पकररात न�मा�र झा�ेला कायदाचा योग सारभूत पश तयार कर�, हे अपी� , दुसरे अपी� प्र�ंनिबत असल्यासर्त्य अपी�सह कायद्या�ुसार गुर्णवत्तेवर नि�र्ण�य घेण्यासाठी . वतेचा आधारे �वा�े न�का�ी काढणासाठी गुरउच्च न्याया�याकडे परत पाठवत आहोतउच नाया�यात अपी� पाठनवणाचे मतकेला�े यावतेवर गुर प्रदलिश�त �टल्याती� कोरतेहीमत वक के�े जात �ाही. र�ुसार, उच नाया�यआदेशात आलर या आक्षेनिपत आदेशात �ोंदनिव�ेल्या कोररही न�रीकरांच्याप्रभावा�ा�ी � येता अनप�ात नि�र्ण�य पारिरत --करती�. [१५, १७, १८] [९-एफएच; १०-एसी]परिरच्छेद निदवार्णी अपी� अलिधकारिरता : निदवार्णी अपी� क्रमांक ३१४८/२०१९. मुंबई उच्च न्याया�या�े आयटीए क्रमांक ५९९/२०१५ मध्ये निद�ांक ०१.०८.२०१७ रोजी पारिरत के�ेल्या न्यायनि�र्ण�य आलिर्ण आदेश यावरू�. अपी�कर्त्य�तफm वकी� - एएसजी निवक्रमजीत बॅ�जo, एस. एस. रॉय, श्रीमती सीमा बेंगा�ी, अ�स जैदी, श्रीमती अनि�� कनिटयार. उत्तरवादीतफm वकी� - कुर्णा� चीमा, अलिजत वाघ. न्याया�याचा न्यायनि�र्ण�य न्या. अभय म�ोहर सप्रे यांचेद्वारे पारिरत करण्यात आ�ा – १. अ�ुमती निद�ी. २. प्रस्ु अपी� हे मुंबई उच्च न्याया�या�े आयटीए क्रमांक ५९९/२०१५ मध्ये निद�ांक ०१.०८.२०१७ रोजी पारिरत के�ेल्या अंनितम न्यायनि�र्ण�य आलिर्ण आदेश यानिवरुद्ध दा�� करण्यात आ�े आहे, ज्यामध्ये उच्च न्याया�या�े याती� अपी�कर्त्या�े दा�� के�े�े अपी� फेटाळू� �ाव�े आहे. ३. या अनिप�ात एक संलिक्ष^ मुद्दा समानिवष्ट आहे जो �ा�ी �मूद के�ेल्या तथ्यांवरू� स्पष्ट होई�. Case: THE PRINCIPAL COMMISSIONER OF INCOME TAX-8 versus M/S YES BANK LTD. [[2019] 5 S.C.R. 6] (2019) [2019] 5 एस.सी.आर. 6 इनकम टैकस-8 के मुखय आयुक बनाम एम/एस यस बैक लि। (सिविल अपील नंबर 3148/2019) 15 मार्च, 2019 [अभय मनोहर सपे और दिनेश माहेशरी, जेजे।] आयकर अधिनियम, 1961-धारा 35- डी, 260-ए और 263-मुद्दा यह था कि क्या प्रतिवादी-बैंक (निर्धारिती) एक औद्योगिक उपक्रम है, ताकि उन्हें 1961 के अधिनियम की धारा 35-डी के अंतर्गत कटौती कादावा करने का अधिकार दिया जा सके-निर्धारण अधिकारी के आदेश पारित होने के बाद, आयुक्त द्वारा प्रतिकूल आदेश पारित किया गया था-आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (आईटीएटी) ने प्रतिवादी द्वारा दायर अपील की अनुमति दी थी-अपीलकर्ता-राजस्व द्वारा उच्च न्यायालय में 1961 अधिनियम की धारा 260-ए के अंतर्गत अपील खारिज की गयी, अपील पर निर्णीत: उच्च न्यायालय ने कानून का कोई भी महत्वपूर्ण प्रश्न तैयार नहीं कियाजैसा कि 1961 अधिनियम की धारा 260-ए के तहत किया जाना आवश्यक है। उच्च न्यायालय ने मामले में उत्पन्न होने वाले किसी भी मुद्दे को तय किए बिना अपील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह आवश्यक नहीं है-इस अपील में शामिल मुख्य मुद्दा, जैसा कि उच्च न्यायालय द्वारा सही रूप से नोट किया गया था, 1961 के अधिनियम की धारा 35- डी की प्रयोज्यता प्रतिवादी के संबंध में थी, यह हालांकि, निर्णीत नहीं किया गया था-अलग आदेश निर्धारित किया गया था-प्रतिवादी को 1961 अधिनियम के एस. 35- डी की प्रयोज्यता के संबंध में मुद्दा एक अन्य अपील में प्रतिवादी के उदाहरण पर उच्च न्यायालय के समक्ष पहले से ही लंबित है-तदनुसार, एक अन्य अपील के साथ कानून के अनुसार योग्यता पर अपने निर्णय के लिए उच्च न्यायालय में अपील की जाती है, यदि लंबित है- मामले के गुण पर कोई राय व्यक्त नहीं की गई। अपील स्वीकार करते हुए, न्यायालय द्वारा अवधारित 1.1-उच्च न्यायालय ने अधिनियम की धारा 260-ए के तहत कानून के किसी भी प्रश्न को तैयार नहीं किया। हालांकि अपील को द्विपक्षीय रूप से सुना गया था। दूसरे शब्दों में, उच्च न्यायालय ने अपील को इस आधार पर खारिज नहीं किया कि अपील में कानून का कोई महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल नहीं है; दूसरा, उच्च न्यायालयने मामले में उत्पन्न किसी भी मुद्दे को तय किए बिना अपील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वह आवश्यकनहीं है। इस अपील में शामिल मुख्य मुद्दा, जैसा कि पैरा 6 में उच्च न्यायालय द्वारा सही नोट किया गया था, प्रतिवादी-निर्धारिती (बैंक) को अधिनियम की धारा 35-डी की प्रयोज्यता के संबंध में था। हालांकि, यह तय किया गया। [पैरा 12,13] [9-सी-ई] 1.2 उच्च न्यायालय को अन्य प्रश्नों के अलावा अधिनियम की धारा 35-डी की प्रयोज्यता पर कानून के महत्वपूर्णप्रश्न को तैयार करना चचाहिए था और फिर उन प्रश्न (ओं) को अनिर्णीत छोड़ने के बजाय कानून के अनुसार निर्णीत करना चचाहिए था। [पैरा 14] [9-ई-एफ] 1.3 विवादित आदेश को रद्द किया जाता है। प्रतिवादी द्वारा हमारे संज्ञान में यह लाया गया था कि प्रतिवादी-बैंकको अधिनियम की धारा 35-डी की प्रयोज्यता के संबंध में पहले से ही एक अपील उच्च न्यायालय के समक्ष विचचाराधीन है। तदनुसार अपील को मामले में उत्पन्न होने वाले कानून के उचित प्रश्न (ओं) को तैयार करने के बाद, एक अन्य अपील, यदि लंबित हो, के साथ कानून के अनुसार गुण-दोष के आधार पर अपने निर्णय के लिएउच्च न्यायालय में भेजा जाता है। मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और अपील को गुण-दोष के आधार पर नये सिरे से निर्णीत करने के लिये उच्च न्यायालय में भेजने की राय बनाई है। उच्च न्यायालय तद्नुसार आक्षेपित आदेश और इस आदेश में की गयी किसी भी टिप्पणी से प्रभावित हुये बिना अपील पर निर्णय करेगा। [पैरा 15,17,18] [9-एफ-एचच; 10-एसी] 2019 का सिविल अपीलीय न्यायाधिकरणः सिविल अपील संख्या 3148 में बॉम्बे के उच्च न्यायालय द्वारा 2015 की आइटीए संख्या 599 में पारित आदेश व निर्णय दिनांकित 01.08.2017 विक्रमजीत बनर्जी, एएसजी, एसएस रॉय, सुश्री सीमा बेनगनी, अनास जैदी, श्रीमती अनिल कटियार, सलाहकार। अपीलार्थी के लिए। कुणाल चचेमा, अजीत वाघ, सलाहकार। उत्तरदाता के लिए। सर्वोच्च न्यायालय की रिपोर्ट [2019] 5 एस.सी.आर.। न्यायालय का निर्णय माननीय न्यायमूर्ति द्वारा प्रतिपादित किया गया। अभय मनोहर सप्रे, जे. 1. अपील स्वीकृत। 2. यह अपील आईटीए नंबर 599/2015 में बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा पारित अंतिम निर्णय और आदेश दिनांकित 01.08.2017 के खिलाफ दायर की गई है, जिसके तहत उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया था। 3. इस अपील में एक छोटा बिंदु शामिल है जैसा कि वर्णित तथ्यों से स्पष्ट होगा। 4. अपीलकर्ता भारत संघ (आयकर विभाग) है और प्रतिवादी-बैंक निर्धारिती है। Case: THE PRINCIPAL COMMISSIONER OF INCOME TAX-8 versus M/S YES BANK LTD. [[2019] 5 S.C.R. 6] (2019) ਇਨਕਮ ਟੈਕਸ-8 ਦਾ ਪ੍ਰਮ ੁੱਖ ਕਮਮਸ਼ਨਰ ਬਨਾਮ ਮੈਸਰਜ਼ ਯਸ ਬੈਂਕ ਮਿਮਮਟੇਡ (2019 3148)ਦੀ ਮਸਵਿ ਅਪ੍ੀਿ ਨੰ. 15 ਮਾਰਚ, 2019 [, ਜੇ.ਜੇ.]ਅਭੈ ਮਨੋਹਰ ਸਪ੍ਰੇ ਅਤੇ ਮਦਨੇਸ਼ ਮਹੇਸ਼ਵਰੀ ਇਨਕਮ ਟੈਕਸ ਐਕਟ, 1961 - ss.35-D, 260-A ਅਤੇ 263 - ਮ ੁੱਦਾ ਇਹ ਸੀ ਮਕ ਕੀ 35-D ਦੇ ਅਧੀਨ ਉੱਤਰਦਾਤਾ-ਬੈਂਕ (ਮ ਿਾਂਕਣ) ਇੁੱਕ ਉਦਯੋਮਿਕ ਅਦਾਰਾ ਹੈ ਤਾਂ ਜੋ ਉਹਨਾਂ ਨ ੰ 1961 ਕਟੌਤੀ ਦਾ ਦਾਅਵਾ ਕਰਨ ਦਾ ਹੁੱਕਦਾਰ ਬਣਾਇਆ ਜਾ ਸਕੇ। ਐਕਟ - ਮ ਿਾਂਕਣ ਅਫਸਰ , ਦ ਆਰਾ ਆਦੇਸ਼ ਪ੍ਾਸ ਕਰਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦਕਮਮਸ਼ਨਰ ਦ ਆਰਾ ਪ੍ਰਤੀਕ ਿ ਆਦੇਸ਼ ਪ੍ਾਸ ਕੀਤਾ ਮਿਆ ਸੀ - ਇਨਕਮ ਟੈਕਸ ਅਪ੍ੀਿੀ ਮਟਰਮਬਊਨਿ (ਆਈ.ਟੀ.ਏ.ਟੀ.) ਨੇ ਜਵਾਬਦੇਹ ਦ ਆਰਾ ਦਾਇਰ ਕੀਤੀ 260- 1961 ਅਪ੍ੀਿ ਦੀ ਇਜਾਜ਼ਤ ਮਦੁੱਤੀ - ਅਪ੍ੀਿਕਰਤਾ-ਮਾਿ ਦ ਆਰਾ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਮਵੁੱਚ ਅਪ੍ੀਿ 'ਤੇ, 1961 ਦੇ ਐਕਟ ਦੇ ਅਧੀਨ ਐਕਟ ਦਾ ਏ - ਖਾਰਜ - ਅਪ੍ੀਿ ਰੁੱਖੀ ਿਈ: ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ 260-ਏ ਦੇ ਤਮਹਤ ਕਾਨ ੰਨ ਦਾ ਕੋਈ ਵੀ ਮਹੁੱਤਵਪ੍ ਰਨ ਸਵਾਿ ਮਤਆਰ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ - ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ 'ਮਬਨਾਂ ਮਕਸੇ ਮ ੁੱਦੇ ਤੇ ਫੈਸਿਾ ਿਏ ਅਪ੍ੀਿ ਨ ੰ ਖਾਰਜ ਕਰ ਮਦੁੱਤਾ ਇਸ ਕੇਸ ਮਵੁੱਚ ਪ੍ੈਦਾ ਹੋਇਆ ਮਕ , ਇਹ ਜ਼ਰ ਰੀ ਨਹੀਂ ਹੈ - ਇਸ ਅਪ੍ੀਿ ਮਵੁੱਚ ਸ਼ਾਮਿ ਮ ੁੱਖ ਮ ੁੱਦਾਮਜਵੇਂ ਮਕ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਦ ਆਰਾ ਸਹੀ ਰ ਪ੍ ਮਵੁੱਚ ਨੋਟ ਕੀਤਾ ਮਿਆ ਹੈ, ਉੱਤਰਦਾਤਾ ਉੱਤੇ 1961 ਐਕਟ ਦੇ s.35-ਡੀ ਦੀ ਿਾਿ ਹੋਣ ਦੇ , , ਸਬੰਧ ਮਵੁੱਚ ਸੀਇਹ ਸੀ। ਹਾਿਾਂਮਕਫੈਸਿਾ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਮਿਆ - ਇਪ੍ਿਨਡ ਆਰਡਰ ਨ ੰ ਪ੍ਾਸੇ ਕਰ 'ਤੇ 1961 ਐਕਟ ਦੇ s.35-ਮਦੁੱਤਾ ਮਿਆ - ਜਵਾਬਦੇਹ ਡੀ ਦੀ ਿਾਿ ਹੋਣ ਦੇ ਸਬੰਧ ਮਵੁੱਚ ਮ ੁੱਦਾ ਇੁੱਕ 'ਹੋਰ ਅਪ੍ੀਿ ਮਵੁੱਚ ਉੱਤਰਦਾਤਾ ਦੇ ਕਮਹਣ ਤੇ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਮਵੁੱਚ ਪ੍ਮਹਿਾਂ ਹੀ ਮਵਚਾਰ ਅਧੀਨ ਹੈ - ਇਸ ਅਨ ਸਾਰ, ਅਪ੍ੀਿ ਮਰਮਾਂਡ ਇੁੱਕ ਹੋਰ ਅਪ੍ੀਿ ਦੇ ਨਾਿ ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਅਨ ਸਾਰ ਯੋਿਤਾਵਾਂ 'ਤੇ ', ਆਪ੍ਣੇ ਫੈਸਿੇ ਿਈ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨ ੰਜੇਕਰ ਿੰਮਬਤ ਹੈ - ਕੇਸ ਦੇ ਿ ਣਾਂ ਤੇ ਕੋਈ ਰਾਏ ਨਹੀਂ ਪ੍ਰਿਟ ਕੀਤੀ ਿਈ। ਅਦਾਿਤ ਨੇ ਅਪ੍ੀਿ ਦੀ ਇਜਾਜ਼ਤ ਮਦੰਦੇ ਹੋਏ ਰੋਮਕਆ ਮਿਆ: 1.1 ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ ਦੋ-ਪ੍ੁੱਖੀ ਅਪ੍ੀਿ 'ਤੇ ਸ ਣਵਾਈ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਆਮਦਨ ਕਰ ਐਕਟ, 1961 ਦੀ ਧਾਰਾ 260-ਏ ਦੇ ਤਮਹਤ ਬਣਾਏ ਜਾਣ ਵਾਿੇ ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਮਕਸੇ ਵੀ , ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ ਇਸ ਆਧਾਰ 'ਤੇ ਮਹੁੱਤਵਪ੍ ਰਨ ਸਵਾਿ ਨ ੰ ਨਹੀਂ ਬਣਾਇਆ। ਦ ਜੇ ਸ਼ਬਦਾਂ ਮਵਚਅਪ੍ੀਿ ਨ ੰ ਖਾਰਜ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਮਕ ਅਪ੍ੀਿ ਮਵਚ ਕਾਨ ੰਨ ਦਾ ਕੋਈ ਠੋਸ ਸਵਾਿ ਸ਼ਾਮਿ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ ਕੇਸ ਮਵੁੱਚ ਪ੍ੈਦਾ ਹੋਏ ਮਕਸੇ ਵੀ ਮ ੁੱਦੇ ਦਾ ਫੈਸਿਾ ਕੀਤੇ ਮਬਨਾਂ ਇਹ ਕਮਹ ਕੇ ਅਪ੍ੀਿ ਖਾਰਜ , 6 ਕਰ ਮਦੁੱਤੀ ਮਕ ਇਹ ਜ਼ਰ ਰੀ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਇਸ ਅਪ੍ੀਿ ਮਵੁੱਚ ਸ਼ਾਮਿ ਮ ੁੱਖ ਮ ੁੱਦਾਮਜਵੇਂ ਮਕ ਪ੍ੈਰਾ ਮਵੁੱਚ , ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਦ ਆਰਾ ਸਹੀ ਰ ਪ੍ ਮਵੁੱਚ ਨੋਟ ਕੀਤਾ ਮਿਆ ਸੀਉੱਤਰਦਾਤਾ-ਅਧਾਰਕ (ਬੈਂਕ) ਉੱਤੇ 1961 ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 35-, ਡੀ ਦੀ ਿਾਿ ਹੋਣ ਦੇ ਸਬੰਧ ਮਵੁੱਚ ਸੀ। ਹਾਿਾਂਮਕਇਹ ਫੈਸਿਾ ਨਹੀਂ 12, 13] [9-ਸੀ-ਈ]ਕੀਤਾ ਮਿਆ ਸੀ. [ਪ੍ਾਰਾ 1.2 ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨ ੰ ਹੋਰ ਸਵਾਿਾਂ ਦੇ ਨਾਿ-ਨਾਿ 1961 ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 35-ਡੀ ਦੀ ਿਾਿ ਹੋਣ 'ਤੇ ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਮਹੁੱਤਵਪ੍ ਰਨ ਸਵਾਿ ਮਤਆਰ ਕਰਨੇ ਚਾਹੀਦੇ ਸਨ ਅਤੇ ਮਫਰ ਸਵਾਿਾਂ (ਸਵਾਿਾਂ) 14] ਨ ੰ ਅਣਮਡੁੱਠਾ ਛੁੱਡਣ ਦੀ ਬਜਾਏ ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਅਨ ਸਾਰ ਉਨਹਾਂ ਦਾ ਜਵਾਬ ਦੇਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਸੀ। [ਪ੍ਰਾ [9-E-F] 1.3 ਇਪ੍ਿਨਡ ਆਰਡਰ ਨ ੰ ਪ੍ਾਸੇ ਰੁੱਮਖਆ ਮਿਆ ਹੈ। ਅਦਾਿਤ ਦੇ ਮਧਆਨ ਮਵੁੱਚ ਮਿਆਂਦਾ 1961 ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 35-ਮਿਆ ਸੀ ਮਕ ਉੱਤਰਦਾਤਾ-ਬੈਂਕ ਉੱਤੇ ਡੀ ਦੀ ਿਾਿ ਹੋਣ ਦੇ ਸਬੰਧ ਮਵੁੱਚ 'ਇੁੱਕ ਅਪ੍ੀਿ ਮਵੁੱਚ ਉੱਤਰਦਾਤਾ ਦੇ ਕਮਹਣ ਤੇ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਮਵੁੱਚ ਪ੍ਮਹਿਾਂ ਹੀ ਮਵਚਾਰ ਅਧੀਨ ਹੈ। ਕੇਸ ਮਵੁੱਚ ਪ੍ੈਦਾ ਹੋਣ ਵਾਿੇ ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਢ ਕਵੇਂ ਮਹੁੱਤਵਪ੍ ਰਨ ਸਵਾਿਾਂ (ਸਵਾਿਾਂ) ਨ ੰ ਮਤਆਰ ਕਰਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ, , ਜੇਕਰ ਿੰਮਬਤ ਹੈ, ਇੁੱਕ ਹੋਰ ਅਪ੍ੀਿ ਦੇ ਨਾਿਤਾਂ ਅਪ੍ੀਿ ਨ ੰ ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਅਨ ਸਾਰ ਯੋਿਤਾਵਾਂ 'ਤੇ ਫੈਸਿੇ ਿਈ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨ ੰ ਮਰਮਾਂਡ ਮਦੁੱਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। ਕੇਸ ਦੇ ਿ ਣਾਂ ਦੇ ਆਧਾਰ 'ਤੇ ਇਸ ਦੇ , ਇਸ ਬਾਰੇ ਮਨਪ੍ਟਾਰੇ ਿਈ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨ ੰ ਅਪ੍ੀਿ ਦਾ ਮਰਮਾਂਡ ਦੇਣ ਿਈ ਰਾਏ ਬਣਾਈ ਿਈ ਹੈ'ਕੋਈ ਰਾਏ ਨਹੀਂ ਪ੍ਰਿਟਾਈ ਿਈ ਹੈ। ਹਾਈਕੋਰਟ ਇਸ ਅਨ ਸਾਰ ਅਪ੍ੀਿ ਤੇ ਫੈਸਿਾ ਿਵੇਿੀ ਅਤੇ ਇਸ 15, 17, 18] [9-F-ਹ ਕਮ ਮਵਚ ਕੀਤੀ ਿਈ ਮਕਸੇ ਵੀ ਮਟੁੱਪ੍ਣੀ ਤੋਂ ਪ੍ਰਭਾਮਵਤ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇਿੀ। [ਪ੍ਾਰਾ H; 10-ਏ-ਸੀ] 2019 3148ਮਸਵਿ ਅਪ੍ੀਿੀ ਅਮਧਕਾਰ ਖੇਤਰ: ਦੀ ਮਸਵਿ ਅਪ੍ੀਿ ਨੰਬਰ 2015 ਦੇ ਆਈ.ਟੀ.ਏ. ਨੰਬਰ 599 ਮਵੁੱਚ ਬੰਬਈ ਮਵਖੇ ਮਨਆਂਇਕ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਦੇ 01.08.2017 ਦੇ ਮਨਰਣੇ ਅਤੇ ਆਦੇਸ਼ ਤੋਂ। ਮਵਕਰਮਜੀਤ ਬੈਨਰਜੀ, ਏ.ਐਸ.ਜੀ., ਐਸ.ਐਸ. ਰਾਏ, , , ਕ . ਸੀਮਾ ਬੇਂਿਾਨੀਅਨਸ ਜ਼ੈਦੀਸਰੀਮਤੀ. ਅਮਨਿ ਕਮਟਆਰ, ਐਡਵੋਕੇਟ. ਅਪ੍ੀਿਕਰਤਾ ਿਈ। ਕ ਨਾਿ ਚੀਮਾ, ਅਜੀਤ ਵਾਘ, ਐਡਵੋਕੇਟ. ਜਵਾਬਦੇਹ ਿਈ. ਵੁੱਿੋਂ ਅਦਾਿਤ ਦਾ ਫੈਸਿਾ ਸ ਣਾਇਆ ਮਿਆ , ਜੇ.ਅਭੈ ਮਨੋਹਰ ਸਪ੍ਰੇ 1. ਛ ੁੱਟੀ ਮਦੁੱਤੀ ਿਈ। 2. 599/2015 ਇਹ ਅਪ੍ੀਿ ਆਈ.ਟੀ.ਏ. ਨੰਬਰ ਮਵੁੱਚ ਬੰਬਈ ਦੇ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਆਫ਼ 01.08.2017 ਮਨਆਂਇਕ ਦ ਆਰਾ ਪ੍ਾਸ ਕੀਤੇ ਿਏ ਦੇ ਅੰਤਮ ਫੈਸਿੇ ਅਤੇ ਆਦੇਸ਼ ਦੇ ਮਵਰ ੁੱਧ ਦਾਇਰ ਕੀਤੀ ਿਈ ਹੈ ਮਜਸ ਮਵੁੱਚ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ ਅਪ੍ੀਿਕਰਤਾ ਦ ਆਰਾ ਦਾਇਰ ਕੀਤੀ ਅਪ੍ੀਿ ਨ ੰ ਖਾਰਜ ਕਰ ਮਦੁੱਤਾ ਹੈ। 3. ਇਸ ਅਪ੍ੀਿ ਮਵੁੱਚ ਇੁੱਕ ਛੋਟਾ ਮਬੰਦ ਸ਼ਾਮਿ ਹੈ ਜੋ ਮਕ ਦੁੱਸੇ ਿਏ ਤੁੱਥਾਂ ਤੋਂ ਸਪ੍ੁੱਸ਼ਟ ਹੋਵੇਿਾ। 4. ਅਪ੍ੀਿਕਰਤਾ ਯ ਨੀਅਨ ਆਫ਼ ਇੰਡੀਆ (ਆਮਦਨ ਕਰ ਮਵਭਾਿ) ਹੈ ਅਤੇ ਜਵਾਬਦਾਤਾ-ਬੈਂਕ ਮ ਿਾਂਕਣਕਰਤਾ ਹੈ। Case: THE PRINCIPAL COMMISSIONER OF INCOME TAX-8 versus M/S YES BANK LTD. [[2019] 5 S.C.R. 6] (2019) Section: ISSUES 6 SUPREME COURT REPORTS [2019] 5 S.C.R. ATHE PRINCIPAL COMMISSIONER OF INCOME TAX-8 v. M/S YES BANK LTD. (Civil Appeal No. 3148 of 2019) B MARCH 15, 2019 [ABHAY MANOHAR SAPRE AND DINESH MAHESHWARI, JJ.] Income Tax Act, 1961 – ss.35-D, 260-A and 263 – Issue wasCas to whether the respondent-Bank (assessee) is an industrialundertaking so as to entitle them to claim deduction u/s.35-D of the1961 Act – After the Assessing Officer passed order, adverse orderwas passed by the Commissioner – Income Tax Appellate Tribunal(ITAT) allowed the appeal filed by the respondent – Appeal by theDappellant-Revenue in the High Court u/s.260-A of the 1961 Act –Dismissed – On appeal, held: High Court did not frame anysubstantial question of law as is required to be framed u/s.260-A ofthe 1961 Act – High Court dismissed the appeal without decidingany issue arising in the case saying that it is not necessary – Mainissue involved in this appeal, as rightly taken note of by the HighECourt, was with regard to the applicability of s.35-D of the 1961Act to the respondent, it was however, not decided – Impugnedorder set aside – Issue with regard to applicability of s.35-D of the1961 Act to the respondent is already pending consideration beforethe High Court at the instance of the respondent in another appealF– Accordingly, appeal remanded to the High Court for its decisionon merits in accordance with law along with another appeal, ifpending – No opinion expressed on the merits of the case. Allowing the appeal, the Court GHELD: 1.1 The High Court did not frame any substantialquestion of law as is required to be framed under Section 260-Aof the Income Tax Act, 1961 though heard the appeal bipartite.In other words, the High Court did not dismiss the appeal inlimine on the ground that the appeal does not involve any H substantial question of law. The High Court dismissed the appealwithout deciding any issue arising in the case saying that it is notnecessary. The main issue involved in this appeal, as rightlytaken note of by the High Court in para 6, was with regard to theapplicability of Section 35-D of the 1961 Act to therespondent-assessee (Bank). It was, however, not decided.[Paras 12, 13] [9-C-E] 1.2 The High Court should have framed the substantialquestion of law on the applicability of Section 35-D of the 1961Act in addition to other questions and then should have answeredthem in accordance with law rather than to leave the question(s)undecided. [Para 14] [9-E-F] 1.3 The impugned order is set aside. It was brought toCourt’s notice that the issue with regard to applicability of Section35-D of the 1961 Act to the respondent-Bank is already pendingconsideration before the High Court at the instance of therespondent in one appeal. The appeal is accordingly remandedto the High Court for its decision on merits in accordance withlaw along with another appeal, if pending, after framing propersubstantial question(s) of law arising in the case. No opinion isexpressed on the merits of the case having formed an opinion toremand the appeal to the High Court for its disposal on the meritsafresh. The High Court will accordingly decide the appealuninfluenced by any observations made in the impugned orderand this order. [Paras 15, 17, 18] [9-F-H; 10-A-C] CIVIL APPELLATE JURISDICTION: Civil Appeal No. 3148of 2019 From the Judgment and Order dated 01.08.2017 of the HighCourt of Judicature at Bombay in ITA No. 599 of 2015. Vikramjit Banerjee, ASG, S. S. Roy, Ms. Seema Bengani, AnasZaidi, Mrs. Anil Katiyar, Advs. for the Appellant. Kunal Cheema, Ajit Wagh, Advs. for the Respondent. A B C D E F G H AThe Judgment of the Court was delivered by ABHAY MANOHAR SAPRE, J. 1. Leave granted. 2. This appeal is filed against the final judgment and order dated01.08.2017 passed by the High Court of Judicature at Bombay in ITABNo.599/2015 whereby the High Court dismissed the appeal filed by theappellant herein. Case: THE PRINCIPAL COMMISSIONER OF INCOME TAX-8 versus M/S YES BANK LTD. [[2019] 5 S.C.R. 6] (2019) उत्तरवादीतफm वकी� - कुर्णा� चीमा, अलिजत वाघ. न्याया�याचा न्यायनि�र्ण�य न्या. अभय म�ोहर सप्रे यांचेद्वारे पारिरत करण्यात आ�ा – १. अ�ुमती निद�ी. २. प्रस्ु अपी� हे मुंबई उच्च न्याया�या�े आयटीए क्रमांक ५९९/२०१५ मध्ये निद�ांक ०१.०८.२०१७ रोजी पारिरत के�ेल्या अंनितम न्यायनि�र्ण�य आलिर्ण आदेश यानिवरुद्ध दा�� करण्यात आ�े आहे, ज्यामध्ये उच्च न्याया�या�े याती� अपी�कर्त्या�े दा�� के�े�े अपी� फेटाळू� �ाव�े आहे. ३. या अनिप�ात एक संलिक्ष^ मुद्दा समानिवष्ट आहे जो �ा�ी �मूद के�ेल्या तथ्यांवरू� स्पष्ट होई�. ४. अपी�कता� हे भारतीय संघराज्य (आयकर निवभाग)आहे आलिर्ण उत्तरवादी-बँक हे करपात्र व्यक्ती आहे. ५. २००७-२००८ या मूल्यांक� वर्ष�साठी उत्तरवादी-करदार्त्यच्या (बँक) कर नि�धा�रर्ण प्रनिक्रयेदरम्या�, उत्तरवादीवादी-करदाते (बँक) संबंलिधत मूल्यांक� वर्ष�साठी आयकर अलिधनि�यम, १९६१ च्या क�म ३५-डी (संलिक्ष^तेसाठी "अलिधनि�यम") अंतग�त वजावटीचा दावा करण्यास पात्र आहेत का, असा प्रश्न नि�मा�र्ण झा�ा. दुसऱ्या शब्दांत, उत्तरवादी-बँक ही एक औद्योनिगक उपक्रम आहे की �ाही असा प्रश्न नि�मा�र्ण झा�ा जेर्णेकरू� र्त्यं�ा कायद्याच्या क�म ३५-डी अंतग�त वजावटीसाठी दावा करण्याचा अलिधकार लिमळे�. ं�ा ६. उत्तरवादीचे प्रकरर्ण असे होते की ते एक औद्योनिगक उपक्रम म्हर्णू� र्त्यकायद्याच्या क�म ३५-डी अंतग�त वजावटीसाठी दावा करण्याचा अलिधकार आहेत. कर नि�धा�रर्ण अलिधकाऱ्या�े निद�ांक ३१.१०.२००९ रोजी एक आदेश पारिरत के�ा ज्यामुळे कायद्याच्या क�म २६३ अन्वये आयुक्तांसमोर काय�वाही सुरू झा�ी आलिर्ण परिरर्णामी आयुक्तां�ी निद�ांक १४.११.२०११ रोजी प्रनितकू� आदेश पारिरत के�ा. ७. यामुळे उत्तरवादी�े आयुक्तांच्या आदेशानिवरोधात आयटीएटीकडे अपी� दा�� के�े. निद�ांक ०५.१२.२०१४ रोजीच्या आदेशाद्वारे आयटीएटी�े अपी� मंजूर के�े ज्यामुळे महसू� (आयकर निवभाग) �े कायद्याच्या क�म २६०-ए अंतग�त उच्च न्याया�यात अपी� दा�� के�े. ८. उच्च न्याया�या�े दोन्ही पक्षांचे म्हर्णर्णे ऐकू� घेतल्या�ंतर आक्षेनिपत आदेशाद्वारे सदर अपी� फेटाळू� �ाव�े आलिर्ण र्त्यमुळे पक्षकारां�ी या न्याया�यात निवशेर्षा अ�ुमती द्वारे प्रस्ुचे अपी� दा�� के�े. ९. र्त्यमुळे या अनिप�ात निवचारकरण्याजोगा संलिक्ष^ प्रश्न असा आहे की, उच्च न्याया�या�े अपी�कर्त्य�चे अपी� फेटाळर्णे योग्य होते का? १०. पक्षकारांतफm उपखि•त निवद्वा� वनिक�ांचे म्हर्णर्णे ऐकू� घेतल्या�ंतर आलिर्ण प्रकरर्णाचे अलिभ�े� याचे अव�ोक� केल्या�ंतर आम्हा�ा अपी� मंजूर करण्यास भाग आहे आलिर्ण आम्ही आक्षेनिपत आदेश रद्दबात� करत आहोत आलिर्ण कायद्या�ुसार गुर्णवत्तेच्या आधारे अनिप�ावर �व्या�े नि�र्ण�य घेण्यासाठी प्रकरर्ण उच्च न्याया�याकडे पाठवत आहोत. ११. आमच्या मते, �ा�ी� �मूद कारर्णांमुळे हे प्रकरर्ण उच्च न्याया�याकडे पाठनिवण्याची गरज आहे. उच नाया�या�े या अनप�ा१२. सव�प्रथम, त दोन्ही पक्षकारांचे म्हर्णर्णे ऐकू�ही -पाख^कर कायदा, १९६१ चा क�म २६०अ अनये आवशक अस�ेला कायदाचा कोरताही सारभूत पश तयार के�ा �ाही., दुसऱ्या शब्दांत सांगायचे तरउच्च न्याया�या�े अपी�मध्ये कायद्याचा कोर्णताही महत्त्वाचा प्रश्न �सल्याच्या आधारावर अपी� फेटाळू� �ाव�े �ाही. दुसरे म्हर्णजे उच्च न्याया�या�े प्रकरर्णामध्ये उद्भव�ेल्या कोर्णर्त्यही मुद्द्यावर नि�र्ण�य � देता अपी� फेटाळू� �ाव�े आलिर्ण असा नि�र्ण�य निद�ा की ते आवश्यक �व्हते. (परिरच्छेद ६ पहा). १३. नितसरे म्हर्णजे, उच नाया�या�े पररचेद ६ मधे योगरिरर्त्य�ोंद घेतलापमारे या --अनप�ात मुख मुदा वादीकरदार�ा (बँक) १९६१ चा कायदाचे क�म ३५ड �ागू उत्तरकरणासंदभा�त होता. मात्र, रवर न�र�य झा�ा �ाही. १४. आमच्या मते, उच नाया�या�े इतर पशांबरोबरच १९६१ चा कायदाती� क�म -३५ड चा अंम�बजावरीबाबत कायदाचा सारभूत पश तयार कराय�ा हवा होता आलरआलिर्ण �ंतर प्रश्न अनि�लिर्ण�त ठेवण्यापेक्षा कायद्या�ुसार र्त्यंची उत्तरे द्याय�ा हवी होती. १५. आमच्या असे नि�दशास आर्णू� देण्यात आ�े आहे की एका अपी�ात उत्तरवादीच्या सांगण्यावरू�, उत्तरवादी-बँके�ा कायद्याचे क�म ३५-डी �ागू करण्यासंदभा�ती� मुद्दा हा उच्च न्याया�यात निवचाराधी� आहे. तसे असे� तर आमच्या मते, दोन्ही अनिप�ांवर एकनित्रत नि�र्ण�य पारिरत व्हाय�ा हवा. १६. वरी� सव� कारर्णांमुळे, आमचे असे मत आहे की आक्षेनिपत आदेश कायदेशीरदृष्ट्या निटकू� राहण्यायोग्य �ाही. १७. वरी� चचा� �क्षात घेता अपी� यशस्वी ठरते आलिर्ण र्त्य�ुसार, सदर अपी� मंजूर र�ुसार या पकररात के�े जाते. आक्षेनिपत आदेश हा रद्दबात� करण्यात आ�ा आहे. न�मा�र झा�ेला कायदाचा योग सारभूत पश तयार कर�, हे अपी� दुसरे अपी� प्र�ंनिबत , असल्यासर्त्य अपी�सह कायद्या�ुसार गुर्णवत्तेवर नि�र्ण�य घेण्यासाठी उच्च न्याया�याकडे परत पाठवत आहोत. Case: THE PRINCIPAL COMMISSIONER OF INCOME TAX-8 versus M/S YES BANK LTD. [[2019] 5 S.C.R. 6] (2019) न्यायालय का निर्णय माननीय न्यायमूर्ति द्वारा प्रतिपादित किया गया। अभय मनोहर सप्रे, जे. 1. अपील स्वीकृत। 2. यह अपील आईटीए नंबर 599/2015 में बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा पारित अंतिम निर्णय और आदेश दिनांकित 01.08.2017 के खिलाफ दायर की गई है, जिसके तहत उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया था। 3. इस अपील में एक छोटा बिंदु शामिल है जैसा कि वर्णित तथ्यों से स्पष्ट होगा। 4. अपीलकर्ता भारत संघ (आयकर विभाग) है और प्रतिवादी-बैंक निर्धारिती है। 5. आकलन वर्ष 2007-2008 के लिए प्रतिवादी-निर्धारिती (बैंक) की मूल्यांकन कार्यवाही के दौरान, यह सवाल उठा कि क्या प्रतिवादी-निर्धारिती (बैंक) आयकर अधिनियम, 1961 (संक्षेप में, "अधिनियम") की धारा 35-डी के तहत प्रश्नगत आकलन वर्ष में कटौती का दावा करने का हकदार था? दूसरे शब्दों में, यह सवाल उठता है कि क्या प्रतिवादी-बैंक एक औद्योगिक उपक्रम है ताकि उन्हें अधिनियम की धारा 35-डी के तहत कटौती का दावा करने का अधिकार दिया जा सके। 6. प्रतिवादी का मामला यह था कि वे एक औद्योगिक उपक्रम होने के नाते अधिनियम की धारा 35-डी के तहत कटौती का दावा करने के हकदार हैं। मूल्यांकन अधिकारी ने 31.10.2009 को एक आदेश पारित किया, जिसनेअधिनियम की धारा 263 के तहत आयुक्त के समक्ष कार्यवाही को जन्म दिया, जिसके परिणामस्वरूप आयुक्त द्वारा दिनांक 14.11.2011 को एक प्रतिकूल आदेश पारित किया गया। 7. इसने आयुक्त के आदेश के खिलाफ आईटीएटी के समक्ष प्रतिवादी द्वारा अपील दायर करने को जन्म दिया। दिनांक 05.12.2014 के आदेश से, आईटीएटी ने अपील की अनुमति दी जिसने अधिनियम की धारा 260-ए के तहत उच्च न्यायालय में राजस्व (आयकर विभाग) द्वारा अपील दायर करने को जन्म दिया। 8. उच्च न्यायालय ने इस न्यायालय में विशेष अवकाश के माध्यम से इस अपील को दायर करने के लिए दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपील को खारिज कर दिया। 9. इसलिए, इस अपील में विचचार के लिए जो संक्षिप्त सवाल उठता है, वह यह है कि क्या उच्च न्यायालय द्वारा अपीलकर्ता की अपील खारिज करना उचित था ? 10. पक्षकारों के विद्वान अधिवक्ता को सुनने और मामले के रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद, हम अपील की अनुमति देने के लिए विवश हैं, विवादित आदेश को रद्द करते हैं और विधि के अनुसार योग्यता के आधार पर अपील को नए सिरे से तय करने के लिए मामले को उच्च न्यायालय में भेजते हैं। 11. हमारे विचचार में, निम्नलिखित कारणों से मामले को उच्च न्यायालय में प्रतिप्रेषित करने की आवश्यकता है12. सबसे पहले, उच्च न्यायालय ने अधिनियम की धारा 260-ए के तहत कानून के किसी भी प्रश्न को तैयार नहींकिया। हालांकि अपील को द्विपक्षीय रूप से सुना गया था। दूसरे शब्दों में, उच्च न्यायालय ने अपील को इस आधार पर खारिज नहीं किया कि अपील में कानून का कोई महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल नहीं है; दूसरा, उच्च न्यायालयने मामले में उत्पन्न किसी भी मुद्दे को तय किए बिना अपील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वह आवश्यकनहीं है। (पैरा 6 देखें)। 13. तीसरा, इस अपील में शामिल मुख्य मुद्दा, जैसा कि पैरा 6 में उच्च न्यायालय द्वारा सही नोट किया गया था, प्रतिवादी-निर्धारिती (बैंक) को अधिनियम की धारा 35-डी की प्रयोज्यता के संबंध में था। हालांकि, यह तय किया गया। 14. हमारे विचचार में, उच्च न्यायालय को अन्य प्रश्नों के अलावा अधिनियम की धारा 35-डी की प्रयोज्यता पर कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न को तैयार करना चचाहिए था और फिर उन प्रश्न (ओं) को अनिर्णीत छोड़ने के बजाय कानून के अनुसार निर्णीत करना चचाहिए था। 15. प्रतिवादी द्वारा हमारे संज्ञान में यह लाया गया था कि प्रतिवादी-बैंक को अधिनियम की धारा 35-डी की प्रयोज्यता के संबंध में पहले से ही एक अपील उच्च न्यायालय के समक्ष विचचाराधीन है। यदि ऐसा है, तो दोनों अपील, हमारे विचचार में, एक साथ तय की जानी चचाहिए। 16. इन सभी कारणों से, हमारा विचचार है कि विवादित आदेश कानूनी रूप से धारणीय नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय की रिपोर्ट [2019] 5 एस.सी.आर.। 17. पूर्वगामी चचर्चा के मद्देनजर, अपील सफल होती है और तदनुसार अनुमति दी जाती है। विवादित आदेश निरस्त किया जाता है। तदनुसार अपील को मामले में उत्पन्न होने वाले कानून के उचित प्रश्न (ओं) को तैयार करने के बाद, एक अन्य अपील, यदि लंबित हो, के साथ कानून के अनुसार गुण-दोष के आधार पर अपने निर्णय के लिए उच्च न्यायालय में भेजा जाता है। 18. हमने मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और अपील को गुण-दोष के आधार पर नये सिरे सेनिर्णीत करने के लिये उच्च न्यायालय में भेजने की राय बनाई है। उच्च न्यायालय तद्नुसार आक्षेपित आदेश और इस आदेश में की गयी किसी भी टिप्पणी से प्रभावित हुये बिना अपील पर निर्णय करेगा।अपील स्वीकार की गयी। Case: THE PRINCIPAL COMMISSIONER OF INCOME TAX-8 versus M/S YES BANK LTD. [[2019] 5 S.C.R. 6] (2019) ਵੁੱਿੋਂ ਅਦਾਿਤ ਦਾ ਫੈਸਿਾ ਸ ਣਾਇਆ ਮਿਆ , ਜੇ.ਅਭੈ ਮਨੋਹਰ ਸਪ੍ਰੇ 1. ਛ ੁੱਟੀ ਮਦੁੱਤੀ ਿਈ। 2. 599/2015 ਇਹ ਅਪ੍ੀਿ ਆਈ.ਟੀ.ਏ. ਨੰਬਰ ਮਵੁੱਚ ਬੰਬਈ ਦੇ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਆਫ਼ 01.08.2017 ਮਨਆਂਇਕ ਦ ਆਰਾ ਪ੍ਾਸ ਕੀਤੇ ਿਏ ਦੇ ਅੰਤਮ ਫੈਸਿੇ ਅਤੇ ਆਦੇਸ਼ ਦੇ ਮਵਰ ੁੱਧ ਦਾਇਰ ਕੀਤੀ ਿਈ ਹੈ ਮਜਸ ਮਵੁੱਚ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ ਅਪ੍ੀਿਕਰਤਾ ਦ ਆਰਾ ਦਾਇਰ ਕੀਤੀ ਅਪ੍ੀਿ ਨ ੰ ਖਾਰਜ ਕਰ ਮਦੁੱਤਾ ਹੈ। 3. ਇਸ ਅਪ੍ੀਿ ਮਵੁੱਚ ਇੁੱਕ ਛੋਟਾ ਮਬੰਦ ਸ਼ਾਮਿ ਹੈ ਜੋ ਮਕ ਦੁੱਸੇ ਿਏ ਤੁੱਥਾਂ ਤੋਂ ਸਪ੍ੁੱਸ਼ਟ ਹੋਵੇਿਾ। 4. ਅਪ੍ੀਿਕਰਤਾ ਯ ਨੀਅਨ ਆਫ਼ ਇੰਡੀਆ (ਆਮਦਨ ਕਰ ਮਵਭਾਿ) ਹੈ ਅਤੇ ਜਵਾਬਦਾਤਾ-ਬੈਂਕ ਮ ਿਾਂਕਣਕਰਤਾ ਹੈ। 5. 2007-2008 ਮ ਿਾਂਕਣ ਸਾਿ ਿਈ ਉੱਤਰਦਾਤਾ-ਮ ਿਾਂਕਣ (ਬੈਂਕ) ਦੀ ਮ ਿਾਂਕਣ ਕਾਰਵਾਈਆਂ ਦੇ ਦੌਰਾਨ, ਇਹ ਸਵਾਿ ਉੱਮਠਆ ਮਕ ਕੀ ਉੱਤਰਦਾਤਾ-ਮ ਿਾਂਕਣਕਰਤਾ (ਬੈਂਕ) ਆਮਦਨ ਕਰ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 35-D ? , 1961 (ਛੋਟੇ ਦੇ ਤਮਹਤ ਕਟੌਤੀ ਦਾ ਦਾਅਵਾ ਕਰਨ ਦਾ ਹੁੱਕਦਾਰ ਸੀਿਈ, "ਐਕਟ") , ਪ੍ਰਸ਼ਨ ਮਵੁੱਚ ਮ ਿਾਂਕਣ ਸਾਿ ਿਈ। ਦ ਜੇ ਸ਼ਬਦਾਂ ਮਵੁੱਚਇਹ ਸਵਾਿ ਉੱਠਦਾ ਹੈ ਮਕ 35-D ਦੇ ਕੀ ਜਵਾਬਦਾਤਾ-ਬੈਂਕ ਇੁੱਕ ਉਦਯੋਮਿਕ ਅਦਾਰਾ ਹੈ ਤਾਂ ਜੋ ਉਹਨਾਂ ਨ ੰ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ ਤਮਹਤ ਕਟੌਤੀ ਦਾ ਦਾਅਵਾ ਕਰਨ ਦਾ ਹੁੱਕਦਾਰ ਬਣਾਇਆ ਜਾ ਸਕੇ। 6. , , ਐਕਟ ਉੱਤਰਦਾਤਾ ਦਾ ਕੇਸ ਇਹ ਸੀ ਮਕ ਉਹਇੁੱਕ ਉਦਯੋਮਿਕ ਅਦਾਰਾ ਹੋਣ ਕਰਕੇਦੀ ਧਾਰਾ 35-D ਅਧੀਨ ਕਟੌਤੀ ਦਾ ਦਾਅਵਾ ਕਰਨ ਦੇ ਹੁੱਕਦਾਰ ਹਨ। ਮ ਿਾਂਕਣ ਅਫਸਰ ਨੇ ਮਮਤੀ 31.10.2009 263 ਨ ੰ ਇੁੱਕ ਹ ਕਮ ਪ੍ਾਸ ਕੀਤਾ ਮਜਸ ਨੇ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ ਅਧੀਨ ਕਮਮਸ਼ਨਰ ਅੁੱਿੇ 14.11.2011 ਕਾਰਵਾਈ ਨ ੰ ਜਨਮ ਮਦੁੱਤਾ ਮਜਸ ਦੇ ਨਤੀਜੇ ਵਜੋਂ ਕਮਮਸ਼ਨਰ ਦ ਆਰਾ ਮਮਤੀ ਨ ੰ ਇੁੱਕ ਉਿਟ ਹ ਕਮ ਪ੍ਾਸ ਕੀਤਾ ਮਿਆ। 7. ਇਸ ਨੇ ਕਮਮਸ਼ਨਰ ਦੇ ਹ ਕਮਾਂ ਦੇ ਮਵਰ ੁੱਧ ਆਈ.ਟੀ.ਏ.ਟੀ. ਦੇ ਸਾਹਮਣੇ ਉੱਤਰਦਾਤਾ 05.12.2014 , ITAT ਨੇ ਦ ਆਰਾ ਅਪ੍ੀਿ ਦਾਇਰ ਕਰਨ ਨ ੰ ਜਨਮ ਮਦੁੱਤਾ। ਦੇ ਆਦੇਸ਼ ਦ ਆਰਾ260-A ਅਪ੍ੀਿ ਦੀ ਇਜਾਜ਼ਤ ਮਦੁੱਤੀ ਮਜਸ ਨੇ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ ਦੇ ਤਮਹਤ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਮਵੁੱਚ ਮਾਿ (ਆਮਦਨ ਕਰ ਮਵਭਾਿ) ਦ ਆਰਾ ਅਪ੍ੀਿ ਦਾਇਰ ਕਰਨ ਨ ੰ ਜਨਮ ਮਦੁੱਤਾ। 8. , ਅਪ੍ਰਵਾਮਨਤ ਹ ਕਮਾਂ ਰਾਹੀਂਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ ਇਸ ਅਦਾਿਤ ਮਵੁੱਚ ਮਵਸ਼ੇਸ਼ ਛ ੁੱਟੀ ਦੇ ਰਾਹੀ ਇਸ ਅਪ੍ੀਿ ਨ ੰ ਦਾਇਰ ਕਰਨ ਨ ੰ ਜਨਮ ਮਦੰਦੇ ਹੋਏ ਦੋਵਾਂ ਮਧਰਾਂ ਨ ੰ ਸ ਣਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਅਪ੍ੀਿ ਨ ੰ ਖਾਰਜ ਕਰ ਮਦੁੱਤਾ। 9. ਇਸ ਿਈ, ਇਸ ਅਪ੍ੀਿ ਮਵੁੱਚ ਮਵਚਾਰ ਕਰਨ ਿਈ ਜੋ ਛੋਟਾ ਸਵਾਿ ਪ੍ੈਦਾ ਹ ੰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਇਹ ਹੈ ਮਕ ਕੀ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਅਪ੍ੀਿਕਰਤਾ ਦੀ ਅਪ੍ੀਿ ਨ ੰ ਖਾਰਜ ਕਰਨਾ ਜਾਇਜ਼ ਸੀ। 10. ਮਧਰਾਂ ਦੇ ਮਵਦਵਾਨ ਵਕੀਿ ਨ ੰ ਸ ਣਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਅਤੇ ਕੇਸ ਦੇ ਮਰਕਾਰਡ ਦੀ ਪ੍ੜਚੋਿ , , ਕਰਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦਅਸੀਂ ਅਪ੍ੀਿ ਨ ੰ ਮਨਜ਼ ਰੀ ਦੇਣ ਿਈ ਮਜ਼ਬ ਰ ਹਾਂਬੇਿੋੜੇ ਹ ਕਮਾਂ ਨ ੰ ਪ੍ਾਸੇ ਕਰ 'ਮਦੁੱਤਾ ਹੈ ਅਤੇ ਮੈਮਰਟ ਦੇ ਅਨ ਸਾਰ ਅਪ੍ੀਿ ਤੇ ਨਵੇਂ ਮਸਰੇ ਤੋਂ ਫੈਸਿਾ ਕਰਨ ਿਈ ਕੇਸ ਨ ੰ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਕੋਿ ਭੇਜ ਮਦੁੱਤਾ ਹੈ। ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਨਾਿ. 11. , ਸਾਡੇ ਮਵਚਾਰ ਮਵੁੱਚਹੇਠ ਮਿਖੇ ਕਾਰਨਾਂ ਕਰਕੇ ਕੇਸ ਨ ੰ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਮਵੁੱਚ ਭੇਜਣ ਦੀ ਿੋੜ ਪ੍ਈ ਹੈ। 12. , ਪ੍ਮਹਿਾਂਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ ਦੋ-ਪ੍ੁੱਖੀ ਅਪ੍ੀਿ ਸ ਣਨ ਦੇ ਬਾਵਜ ਦ ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਸੈਕਸ਼ਨ 260-ਏ ਦੇ ਤਮਹਤ ਬਣਾਏ ਜਾਣ ਵਾਿੇ ਕਾਨ ੰਨ ਦਾ ਕੋਈ ਠੋਸ ਸਵਾਿ ਨਹੀਂ ਬਣਾਇਆ। ਦ ਜੇ ਸ਼ਬਦਾਂ ਮਵਚ, ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ ਇਸ ਆਧਾਰ 'ਤੇ ਅਪ੍ੀਿ ਨ ੰ ਖਾਰਜ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਮਕ ਅਪ੍ੀਿ ਮਵਚ ਕਾਨ ੰਨ ਦਾ ; ਦ ਜਾ, ਕੋਈ ਠੋਸ ਸਵਾਿ ਸ਼ਾਮਿ ਨਹੀਂ ਹੈਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨੇ ਕੇਸ ਮਵੁੱਚ ਪ੍ੈਦਾ ਹੋਏ ਮਕਸੇ ਵੀ ਮ ੁੱਦੇ ਦਾ 6 ਫੈਸਿਾ ਕੀਤੇ ਮਬਨਾਂ ਇਹ ਕਮਹ ਕੇ ਅਪ੍ੀਿ ਖਾਰਜ ਕਰ ਮਦੁੱਤੀ ਮਕ ਇਹ ਜ਼ਰ ਰੀ ਨਹੀਂ ਹੈ। (ਪ੍ੈਰਾ ਦੇਖੋ)। 13. ਤੀਜਾ, , 6 ਇਸ ਅਪ੍ੀਿ ਮਵੁੱਚ ਸ਼ਾਮਿ ਮ ੁੱਖ ਮ ੁੱਦਾਮਜਵੇਂ ਮਕ ਪ੍ੈਰਾ ਮਵੁੱਚ ਹਾਈ ਕੋਰਟ , ਦ ਆਰਾ ਸਹੀ ਰ ਪ੍ ਮਵੁੱਚ ਨੋਟ ਕੀਤਾ ਮਿਆ ਸੀਜਵਾਬਦਾਤਾ-ਅਧਾਰਕ (ਬੈਂਕ) ਉੱਤੇ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 35-, ਡੀ ਦੀ ਿਾਿ ਹੋਣ ਦੇ ਸਬੰਧ ਮਵੁੱਚ ਸੀ। ਹਾਿਾਂਮਕਇਹ ਫੈਸਿਾ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਮਿਆ ਸੀ. 14. , 35-ਡੀ ਸਾਡੇ ਮਵਚਾਰ ਮਵੁੱਚਹਾਈ ਕੋਰਟ ਨ ੰ ਹੋਰ ਸਵਾਿਾਂ ਤੋਂ ਇਿਾਵਾ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ ਦੀ ਿਾਿ ਹੋਣ 'ਤੇ ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਮਹੁੱਤਵਪ੍ ਰਨ ਸਵਾਿ ਮਤਆਰ ਕਰਨੇ ਚਾਹੀਦੇ ਸਨ ਅਤੇ ਮਫਰ ਸਵਾਿ s) ਨ ੰ ਛੁੱਡਣ ਦੀ ਬਜਾਏ ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਅਨ ਸਾਰ ਉਨਹਾਂ ਦਾ ਜਵਾਬ ਦੇਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਸੀ। ਅਮਨਸ਼ਮਚਤ। 15. ਇਹ ਸਾਡੇ ਮਧਆਨ ਮਵੁੱਚ ਮਿਆਂਦਾ ਮਿਆ ਸੀ ਮਕ ਪ੍ਰਤੀਵਾਦੀ-ਬੈਂਕ ਉੱਤੇ ਐਕਟ ਦੀ ਧਾਰਾ 35-'ਡੀ ਿਾਿ ਹੋਣ ਦੇ ਸਬੰਧ ਮਵੁੱਚ ਇੁੱਕ ਅਪ੍ੀਿ ਮਵੁੱਚ ਉੱਤਰਦਾਤਾ ਦੇ ਕਮਹਣ ਤੇ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਮਵੁੱਚ , , ਪ੍ਮਹਿਾਂ ਹੀ ਮਵਚਾਰ ਅਧੀਨ ਹੈ। ਜੇਕਰ ਅਮਜਹਾ ਹੈਤਾਂ ਸਾਡੇ ਮਵਚਾਰ ਮਵੁੱਚਦੋਵੇਂ ਅਪ੍ੀਿਾਂ ਦਾ ਫੈਸਿਾ ਇਕੁੱਠੇ ਕੀਤਾ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। 16. , ਇਹ ਇਹਨਾਂ ਸਾਰੇ ਕਾਰਨਾਂ ਕਰਕੇਸਾਡਾ ਮਵਚਾਰ ਹੈ ਮਕ ਅਪ੍ਰਵਾਮਨਤ ਹ ਕਮ ਕਾਨ ੰਨੀ ਤੌਰ 'ਤੇ ਮਟਕਾਊ ਨਹੀਂ ਹੈ। 17. , ਉਪ੍ਰੋਕਤ ਚਰਚਾ ਦੇ ਮੁੱਦੇਨਜ਼ਰਅਪ੍ੀਿ ਸਫਿ ਹ ੰਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਉਸ ਅਨ ਸਾਰ ਇਜਾਜ਼ਤ ਮਦੁੱਤੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। ਅਪ੍ਰਵਾਮਨਤ ਆਰਡਰ ਨ ੰ ਪ੍ਾਸੇ ਰੁੱਮਖਆ ਮਿਆ ਹੈ। ਕੇਸ ਮਵੁੱਚ ਪ੍ੈਦਾ ਹੋਣ ਵਾਿੇ ਕਾਨ ੰਨ , ਦੇ ਢ ਕਵੇਂ ਮਹੁੱਤਵਪ੍ ਰਨ ਸਵਾਿਾਂ (ਸਵਾਿਾਂ) ਨ ੰ ਮਤਆਰ ਕਰਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦਇੁੱਕ ਹੋਰ ਅਪ੍ੀਿ ਦੇ ਨਾਿ, ਜੇਕਰ ਿੰਮਬਤ ਹੈ, 'ਤੇ ਫੈਸਿੇ ਿਈ ਹਾਈ ਕੋਰਟ ਤਾਂ ਅਪ੍ੀਿ ਨ ੰ ਕਾਨ ੰਨ ਦੇ ਅਨ ਸਾਰ ਯੋਿਤਾਵਾਂ ਨ ੰ ਮਰਮਾਂਡ ਮਦੁੱਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ। 18. 'ਅਸੀਂ ਹਾਈਕੋਰਟ ਨ ੰ ਅਪ੍ੀਿ ਨ ੰ ਦ ਬਾਰਾ ਮੈਮਰਟ ਤੇ ਮਨਪ੍ਟਾਰੇ ਿਈ ਮਰਮਾਂਡ ਦੇਣ ਿਈ 'ਰਾਇ ਬਣਾ ਕੇ ਕੇਸ ਦੇ ਿ ਣਾਂ ਤੇ ਕੋਈ ਰਾਏ ਨਹੀਂ ਜ਼ਾਹਰ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਹਾਈਕੋਰਟ ਇਸ ਅਨ ਸਾਰ 'ਅਪ੍ੀਿ ਤੇ ਫੈਸਿਾ ਿਵੇਿੀ ਅਤੇ ਇਸ ਹ ਕਮ ਮਵਚ ਕੀਤੀ ਿਈ ਮਕਸੇ ਵੀ ਮਟੁੱਪ੍ਣੀ ਤੋਂ ਪ੍ਰਭਾਮਵਤ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇਿੀ। ਮਦਮਵਆ ਪ੍ਾਂਡੇ ਦੀ ਅਪ੍ੀਿ ਨ ੰ ਮਨਜ਼ ਰੀ ਮਦੁੱਤੀ ਿਈ। Case: THE PRINCIPAL COMMISSIONER OF INCOME TAX-8 versus M/S YES BANK LTD. [[2019] 5 S.C.R. 6] (2019) Vikramjit Banerjee, ASG, S. S. Roy, Ms. Seema Bengani, AnasZaidi, Mrs. Anil Katiyar, Advs. for the Appellant. Kunal Cheema, Ajit Wagh, Advs. for the Respondent. A B C D E F G H AThe Judgment of the Court was delivered by ABHAY MANOHAR SAPRE, J. 1. Leave granted. 2. This appeal is filed against the final judgment and order dated01.08.2017 passed by the High Court of Judicature at Bombay in ITABNo.599/2015 whereby the High Court dismissed the appeal filed by theappellant herein. 3. This appeal involves a short point as would be clear from thefacts stated infra. 4. The appellant is the Union of India (Income Tax Department)Cand the respondent-Bank is the assessee. 5. In the course of assessment proceedings of the respondent-assessee(Bank) for the Assessment Year 2007-2008, the question aroseas to whether the respondent-assessee(Bank) was entitled to claimdeduction under Section 35-D of the Income Tax Act, 1961 (for short,D“the Act”) for the Assessment Year in question. In other words, thequestion arose as to whether the respondent-Bank is an industrialundertaking so as to entitle them to claim deduction under Section 35-Dof the Act. E6. The case of the respondent was that they, being an industrialundertaking, are entitled to claim the deduction under Section 35-D ofthe Act. The Assessing Officer passed an order dated 31.10.2009 whichgave rise to the proceedings before the Commissioner under Section263 of the Act which resulted in passing of an adverse order dated14.11.2011 by the Commissioner.F E 7. This gave rise to filing of the appeal by the respondent beforethe ITAT against the order of the Commissioner. By order dated05.12.2014, the ITAT allowed the appeal which gave rise to filing of theappeal by the Revenue (Income Tax Department) in the High Courtunder Section 260-A of the Act.G 8. By impugned order, the High Court dismissed the appeal afterhearing both the parties giving rise to filing of this appeal by way ofspecial leave in this Court. PRINCIPAL COMMISSIONER OF INCOME TAX-8 v.M/S YES BANK LTD. [ABHAY MANOHAR SAPRE, J.] 9. So, the short question that arises for consideration in this appeal,is whether the High Court was justified in dismissing the appellant’sappeal. 10. Having heard the learned counsel for the parties and on perusalof the record of the case, we are constrained to allow the appeal, setaside the impugned order and remand the case to the High Court fordeciding the appeal afresh on merits in accordance with law. 11. In our view, the need to remand the case to the High Court iscalled for due to the following reasons. 12. First, the High Court did not frame any substantial question oflaw as is required to be framed under Section 260-A of the Act thoughheard the appeal bipartite. In other words, the High Court did not dismissthe appeal in limine on the ground that the appeal does not involve anysubstantial question of law; Second, the High Court dismissed the appealwithout deciding any issue arising in the case saying that it is not necessary.(see para 6). 13. Third, the main issue involved in this appeal, as rightly takennote of by the High Court in para 6, was with regard to the applicabilityof Section 35-D of the Act to the respondent-assessee(Bank). It was,however, not decided. 14. In our view, the High Court should have framed the substantialquestion of law on the applicability of Section 35-D of the Act in additionto other questions and then should have answered them in accordancewith law rather than to leave the question(s) undecided. 15. It was brought to our notice that the issue with regard toapplicability of Section 35-D of the Act to the respondent-Bank is alreadypending consideration before the High Court at the instance of therespondent in one appeal. If that be so, both the appeals, in our view,should be decided together. 16. It is for all these reasons, we are of the view that the impugnedorder is not legally sustainable. AB CD E F G Case: THE PRINCIPAL COMMISSIONER OF INCOME TAX-8 versus M/S YES BANK LTD. [[2019] 5 S.C.R. 6] (2019) १६. वरी� सव� कारर्णांमुळे, आमचे असे मत आहे की आक्षेनिपत आदेश कायदेशीरदृष्ट्या निटकू� राहण्यायोग्य �ाही. १७. वरी� चचा� �क्षात घेता अपी� यशस्वी ठरते आलिर्ण र्त्य�ुसार, सदर अपी� मंजूर र�ुसार या पकररात के�े जाते. आक्षेनिपत आदेश हा रद्दबात� करण्यात आ�ा आहे. न�मा�र झा�ेला कायदाचा योग सारभूत पश तयार कर�, हे अपी� दुसरे अपी� प्र�ंनिबत , असल्यासर्त्य अपी�सह कायद्या�ुसार गुर्णवत्तेवर नि�र्ण�य घेण्यासाठी उच्च न्याया�याकडे परत पाठवत आहोत. १८. गुर्णवत्तेच्या आधारे �व्या�े नि�का�ी काढण्यासाठी उच्च न्याया�यात अपी� केला�े यागुरवतेवर कोरतेही मत वकपाठनिवण्याचे मत प्रदलिश�त आम्ही �टल्याती� के�े �ाही. र�ुसार, उच नाया�यआदेशात आलर या आदेशात आक्षेनिपत �ोंदनिव�ेल्या कोररही न�रीकरांच्या प्रभावा�ा�ी � येता अनप�ात नि�र्ण�य पारिरत करती�. अपी� मंजूर के�े जाते. ********************* अस्वीकरर्ण या न्यायनि�र्ण�याचा मराठी भार्षाेती� या अ�ुवादाचा वापर हा पक्षकारास र्त्यच्या/नितच्या मातृभार्षाेमध्ये र्त्यचा अथ� समजू� घेण्यापुरताच मया�दीत राही� आलिर्ण र्त्यचा इतर कोर्णर्त्यही कारर्णास्तव वापर करता येर्णार �ाही, तसेच इंग्रजी भार्षाेती� न्यायनि�र्ण�य हाच सव� व्यावहारिरक आलिर्ण कायायी� वापराकरिरता निवश्वस�ीय असे� आलिर्ण तोच र्त्यती� आदेशाच्या नि�ष्पाद� आलिर्ण अंम�बजावर्णी करता वैध मा��ा जाई�. Case: THE PRINCIPAL COMMISSIONER OF INCOME TAX-8 versus M/S YES BANK LTD. [[2019] 5 S.C.R. 6] (2019) 18. हमने मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और अपील को गुण-दोष के आधार पर नये सिरे सेनिर्णीत करने के लिये उच्च न्यायालय में भेजने की राय बनाई है। उच्च न्यायालय तद्नुसार आक्षेपित आदेश और इस आदेश में की गयी किसी भी टिप्पणी से प्रभावित हुये बिना अपील पर निर्णय करेगा।अपील स्वीकार की गयी। Vetted by Himanshu Verma-II Additional Civil Judge (J.D.), Court No-2. Outline Court, Sambhal. Case: THE PRINCIPAL COMMISSIONER OF INCOME TAX-8 versus M/S YES BANK LTD. [[2019] 5 S.C.R. 6] (2019) 18. 'ਅਸੀਂ ਹਾਈਕੋਰਟ ਨ ੰ ਅਪ੍ੀਿ ਨ ੰ ਦ ਬਾਰਾ ਮੈਮਰਟ ਤੇ ਮਨਪ੍ਟਾਰੇ ਿਈ ਮਰਮਾਂਡ ਦੇਣ ਿਈ 'ਰਾਇ ਬਣਾ ਕੇ ਕੇਸ ਦੇ ਿ ਣਾਂ ਤੇ ਕੋਈ ਰਾਏ ਨਹੀਂ ਜ਼ਾਹਰ ਕੀਤੀ ਹੈ। ਹਾਈਕੋਰਟ ਇਸ ਅਨ ਸਾਰ 'ਅਪ੍ੀਿ ਤੇ ਫੈਸਿਾ ਿਵੇਿੀ ਅਤੇ ਇਸ ਹ ਕਮ ਮਵਚ ਕੀਤੀ ਿਈ ਮਕਸੇ ਵੀ ਮਟੁੱਪ੍ਣੀ ਤੋਂ ਪ੍ਰਭਾਮਵਤ ਨਹੀਂ ਹੋਵੇਿੀ। ਮਦਮਵਆ ਪ੍ਾਂਡੇ ਦੀ ਅਪ੍ੀਿ ਨ ੰ ਮਨਜ਼ ਰੀ ਮਦੁੱਤੀ ਿਈ। ਡਿਸਕਲੇਮਰ ਸਥਾਨਕ ਭਾਸਾ ਡ ਿੱਚ ਅਨੁ ਾਦ ਕੀਤਾ ਡਿਆ ਡਨਆ ਡਨਰਣਾਂ ਕੇ ਲ ਮੁਕਿੱਦਮੇਬਾਜਾਂ ਲਈ ਉਹਨਾਂ ਦੀ ਆਪਣੀ ਭਾਸਾ ਡ ਿੱਚ ਸਮਝਣ ਤਿੱਕ ਹੀ ਸੀਮਤ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸਦਾ ਡਕਸੇ ਹੋਰ ਉਦੇਸ ਲਈ ਇਸਤੇਮਾਲ ਨਹੀਾਂ ਕੀਤਾ ਜਾ ਸਕਦਾ । ਸਾਰੇ ਡ ਹਾਰਕ ਅਤੇ ਅਡਿਕਾਰਤ ਮੰਤ ਾਂ ਲਈ ਡਨਆਾਂ ਡਨਰਣੇ ਦਾ ਅੰਿਰੇਜੀ ਸੰਸਕਰਣ ਪਰਮਾਡਣਕ ਹੋ ੇਿਾ ਅਤੇ ਅਮਲ ਲਾਿੂ ਕਰਨ ਲਈ ਇਸ ਨੂੰ ਤਰਜੀਹ ਡਦਿੱਤੀ ਜਾ ੇਿੀ। Tarun Mehra Advocate Case: THE PRINCIPAL COMMISSIONER OF INCOME TAX-8 versus M/S YES BANK LTD. [[2019] 5 S.C.R. 6] (2019) 15. It was brought to our notice that the issue with regard toapplicability of Section 35-D of the Act to the respondent-Bank is alreadypending consideration before the High Court at the instance of therespondent in one appeal. If that be so, both the appeals, in our view,should be decided together. 16. It is for all these reasons, we are of the view that the impugnedorder is not legally sustainable. AB CD E F G A17. In view of the foregoing discussion, the appeal succeeds andis accordingly allowed. The impugned order is set aside. The appeal isaccordingly remanded to the High Court for its decision on merits inaccordance with law along with another appeal, if pending, after framingproper substantial question(s) of law arising in the case. B 18. We have not expressed any opinion on the merits of the casehaving formed an opinion to remand the appeal to the High Court for itsdisposal on the merits afresh. The High Court will accordingly decidethe appeal uninfluenced by any observations made in the impugned orderand this order. C Divya Pandey Appeal allowed. D E F G H
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